शिव पुराण – अध्याय 3: पार्वती और शिव का विवाह

पार्वती और शिव का विवाह
सती के आत्मदाह के बाद, शिव अपनी प्रिय पत्नी के वियोग में गहरे शोक में डूब गए थे। उन्होंने संसार से विरक्त होकर कैलाश पर्वत पर समाधि में लीन हो गए। परन्तु, नियति ने उनके लिए एक और मिलन लिख रखा था, सती ने हिमालय राजा की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया था।
पार्वती की कठोर तपस्या
पार्वती, पूर्वजन्म की स्मृतियों से अनजान, बचपन से ही शिव के प्रति आकर्षित थीं। जैसे-जैसे वह बड़ी हुईं, उनकी शिव को पति रूप में पाने की इच्छा और प्रबल होती गई। उन्होंने अपनी माता मैना से शिव के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त की। माता ने उन्हें समझाया कि शिव को पाना आसान नहीं है, वे महान तपस्वी हैं। पार्वती ने दृढ़ निश्चय से कहा, "माता, यदि शिव को पाना है तो तपस्या ही मार्ग है। मैं उनकी अर्धांगिनी बनने के लिए कठोर तपस्या करूंगी।"
पार्वती ने अपने पिता हिमालय से अनुमति लेकर घोर तपस्या आरम्भ कर दी। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया, केवल वायु और फल खाकर निर्वाह किया। सर्दी, गर्मी, वर्षा सब सहती हुई, वह शिव के ध्यान में मग्न रहतीं। उनकी तपस्या की अग्नि तीनो लोकों में फैल गई। "हे शिव, हे महादेव! मुझ पर कृपा करो," पार्वती मन ही मन प्रार्थना करती रहतीं। "मुझे अपनी सेवा करने की अनुमति दो। मुझे अपनी अर्धांगिनी बनाओ!"
कामदेव का भस्म होना
देवताओं ने पार्वती की तपस्या को शिव तक पहुंचाने का प्रयत्न किया, किन्तु शिव समाधि में अटल थे। तब इंद्र ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। कामदेव वसंत ऋतु लेकर कैलाश पहुंचे और अपने पुष्प बाणों से शिव को विचलित करने का प्रयास किया। रति, कामदेव की पत्नी, व्याकुल थी। उसे पता था कि शिव की क्रोधाग्नि कितनी भयंकर हो सकती है।
शिव की समाधि भंग हुई, और उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोली। उनकी क्रोधाग्नि से कामदेव तत्क्षण भस्म हो गए। रति विलाप करने लगी। देवताओं ने शिव से कामदेव को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की, किन्तु शिव अपनी तपस्या में फिर से लीन हो गए। देवताओं को उनकी लीला समझ में आ गई। शिव ने मन ही मन सोचा, "यह प्रेम की परीक्षा थी। पार्वती की प्रेम शक्ति ने कामदेव को भस्म कर दिया, तभी नई सृष्टि का मार्ग प्रशस्त होगा।"
शिव और पार्वती का विवाह
अंत में, शिव ने पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए। उन्होंने पार्वती से विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे पार्वती ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। हिमालय और मैना के आनंद की सीमा न रही। उन्होंने तुरंत विवाह की तैयारियाँ आरम्भ कर दीं। समस्त देवताओं, गंधर्वों और ऋषियों को विवाह में आमंत्रित किया गया। कैलाश पर्वत पर उत्सव मनाया गया, जहाँ शिव और पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
भगवान विष्णु ने कन्यादान किया और ब्रह्मा जी ने विवाह मंत्रों का उच्चारण किया। शिव और पार्वती चिरकाल के लिए एक हो गए। पार्वती अब शिव की अर्धांगिनी बनीं, और जगत को एक नई शक्ति मिली। उनके विवाह से प्रेम और भक्ति की महिमा स्थापित हुई। इस विवाह के पश्चात् शिव ने संसार को ज्ञान और प्रेम का सन्देश दिया, ताकि सब अपने जीवन को सार्थक बना सकें। अब इसके पश्चात, शिव की विभूतियों और शक्तियों की कथाएं सुनाई जायेंगी। उनके अद्भुत पराक्रम और भक्तों के प्रति उनकी करुणा की गाथाएं आगे बढ़ेंगी।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में पार्वती की कठोर तपस्या, कामदेव का भस्म होना, और शिव पार्वती के विवाह का वर्णन है। यह अध्याय दर्शाता है कि सच्ची भक्ति और निष्ठा से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है और प्रेम अंततः विजय प्राप्त करता है। इस अध्याय से यह शिक्षा मिलती है कि प्रेम और समर्पण से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।
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