रामचरितमानस – अध्याय 5: सुन्दरकाण्ड: हनुमान की यात्रा

सुन्दरकाण्ड: हनुमान की यात्रा
किष्किन्धाकाण्ड में प्रभु श्री राम ने वानर सेना के साथ मित्रता स्थापित की और हनुमान को अपना दूत बनाकर माता सीता की खोज में भेजा। अब हनुमान, भगवान राम के विश्वास और अपने असीम बल के साथ, लंका की ओर उड़ान भरने के लिए तैयार हैं। उनका हृदय राम भक्ति से ओत-प्रोत है, और वे माता सीता को सकुशल वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
हनुमान का लंका गमन
महेंद्र पर्वत पर खड़े हनुमान ने गहरी सांस ली। पवनपुत्र का शरीर विशालकाय हो गया। उनकी आंखें तेज से चमक रही थीं, मानो उनमें सूर्य का प्रकाश समाहित हो गया हो। सम्पूर्ण वानर सेना उन्हें देख रही थी, उत्सुकता और श्रद्धा से परिपूर्ण। हनुमान ने मन ही मन प्रभु राम का स्मरण किया, उनके चरणों को स्पर्श किया और फिर "जय श्री राम" का नारा लगाते हुए आकाश की ओर छलांग लगाई। उनकी छलांग इतनी शक्तिशाली थी कि पर्वत भी काँप उठा।
समुद्र में उनकी छाया एक विशालकाय पक्षी की तरह दिख रही थी। पवन के वेग से वे बादलों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। नीचे, समुद्र में, नागमाता सुरसा ने उनकी परीक्षा लेने के लिए अपना मुख फैलाया। "हनुमान! मुझे भोजन चाहिए," उसने कहा। हनुमान ने विनम्रता से कहा, "हे माता, मैं राम का दूत हूँ और सीता की खोज में जा रहा हूँ। लौटने पर मैं अवश्य आपके मुख में प्रवेश करूँगा।" सुरसा नहीं मानी। तब हनुमान ने तुरंत अपना आकार छोटा किया और पलक झपकते ही उसके मुख में प्रवेश कर बाहर निकल आए। सुरसा प्रसन्न हुई और उन्हें आशीर्वाद दिया, "राम काज सफल हो।"
सीता से भेंट और चूड़ामणि देना
लंका में प्रवेश करते ही हनुमान ने अपना आकार छोटा कर लिया। वे एक साधारण वानर के रूप में अशोक वाटिका में पहुंचे। वहाँ, उन्होंने माता सीता को एक वृक्ष के नीचे, व्याकुल और उदास अवस्था में देखा। राक्षसियां उन्हें चारों ओर से घेरे हुए थीं। हनुमान एक पेड़ पर छिपकर बैठे और राम कथा का गायन करने लगे। सीता ने आश्चर्य से ऊपर देखा। उन्हें लगा, यह कोई स्वप्न है।
धीरे-धीरे हनुमान माता सीता के सामने प्रकट हुए और उन्हें राम की अंगूठी दिखाई। सीता ने उस अंगूठी को पहचान लिया। उनकी आंखें खुशी से भर आईं। हनुमान ने उन्हें प्रभु राम का संदेश सुनाया और आश्वासन दिया कि वे शीघ्र ही उन्हें रावण के बंधन से मुक्त करा लेंगे। सीता ने हनुमान को अपनी चूड़ामणि दी, जिसे प्रभु राम को देना था, यह विश्वास का प्रतीक था कि उन्होंने माता सीता से भेंट की है और संदेश पहुंचाया है। "हे हनुमान! प्रभु राम को मेरा प्रणाम कहना और उनसे कहना कि मैं उनकी प्रतीक्षा कर रही हूँ। रावण के अत्याचार असहनीय हैं।" सीता ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा।
हनुमान ने माता सीता को ढांढस बंधाया, "माता, आप धैर्य रखें। प्रभु राम जल्द ही लंका आकर रावण का अंत करेंगे।" हनुमान जानते थे कि प्रभु राम की कृपा से सब कुछ संभव है। उनका विश्वास, सीता की पीड़ा और राम की भक्ति, यह सब मिलकर एक अटूट बंधन बना रहे थे।
लंका दहन
सीता से भेंट के बाद, हनुमान ने रावण की शक्ति का अनुमान लगाने के लिए लंका में उत्पात मचाना शुरू कर दिया। उन्होंने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया और रावण के पुत्र अक्षय कुमार को मार डाला। फिर वे रावण के सामने उपस्थित हुए और उसे सीता को राम को लौटाने की सलाह दी। रावण क्रोधित हुआ और उसने हनुमान को बंदी बनाने का आदेश दिया। हनुमान को मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र से बांध लिया। हनुमान जानते थे कि वे ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हैं, इसलिए उन्होंने बंधना स्वीकार किया।
रावण ने हनुमान से पूछा, "कौन हो तुम और क्यों लंका में उत्पात मचा रहे हो?" हनुमान ने निर्भयता से उत्तर दिया, "मैं राम का दास हूं और सीता की खोज में आया हूं। रावण, तुमने सीता का हरण करके बहुत बड़ा पाप किया है। राम से क्षमा मांगो और सीता को लौटा दो, अन्यथा तुम्हारा विनाश निश्चित है।" रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। फिर, हनुमान ने अपनी जलती हुई पूंछ से पूरी लंका में आग लगा दी। सोने की लंका धू-धू कर जल उठी। यह राम के क्रोध का प्रतीक था, जो जल्द ही रावण के ऊपर टूटने वाला था।
लंका दहन करके हनुमान समुद्र पार वापस लौट आए। उन्होंने वानर सेना को माता सीता से भेंट और लंका के हाल का वर्णन किया। अब राम और उनकी सेना लंका पर आक्रमण करने के लिए तत्पर हैं। अगले अध्याय में, लंकाकाण्ड में, हम राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध और अंततः रावण के विनाश की कथा देखेंगे।
अध्याय 5 का सार: सुन्दरकाण्ड में हनुमान की लंका यात्रा, सीता से भेंट और लंका दहन का वर्णन है। यह अध्याय हनुमान की राम भक्ति, साहस और बुद्धि का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि भक्ति और समर्पण से बड़ी से बड़ी बाधा को भी पार किया जा सकता है।
संबंधित लेख

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 5: भक्ति का फल और सीख
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 5 — भक्ति का फल और सीख। यह अंतिम अध्याय बताता है कि कालाष्टमी व्रत रखने से प्राप्त होने वाले परिणाम और इससे मिली सीख क्या है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 4: दिव्य हस्तक्षेप और आशीर्वाद
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 4 — दिव्य हस्तक्षेप और आशीर्वाद। अध्याय चार में, भगवान भैरव भक्त की अटूट भक्ति से प्रसन्न होते हैं और उसे अपना आशीर्वाद देते हैं।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 3: परीक्षा और कष्टों का सामना
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 3 — परीक्षा और कष्टों का सामना। इस अध्याय में, भक्त को भगवान की कृपा प्राप्त करने से पहले कई बाधाओं और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 2: भक्त की विनती और भक्ति
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 2 — भक्त की विनती और भक्ति। इस अध्याय में, एक भक्त की सच्ची भक्ति और भगवान भैरव से उसकी पुकार का वर्णन किया गया है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 1: कालाष्टमी व्रत का उद्भव
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 1 — कालाष्टमी व्रत का उद्भव। यह अध्याय बताता है कि कालाष्टमी व्रत का जन्म कैसे हुआ और इसका महत्व क्या है।

पातंजल योगसूत्र – अध्याय 5: विरासत: मिलन और मुक्ति
पातंजल योगसूत्र का अध्याय 5 — विरासत: मिलन और मुक्ति। यह अध्याय पतंजलि की विरासत, योग के माध्यम से मिलन और मुक्ति के मार्ग, और उनके दर्शन के शाश्वत महत्व को दर्शाता है।