शिव पुराण – अध्याय 5: शिव और उनके गणों की कथा | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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शिव पुराण – अध्याय 5: शिव और उनके गणों की कथा

Tilak Kathayein13 Apr 202632 views📖 1 min read
शिव पुराण
शिव पुराण का अध्याय 5 — शिव और उनके गणों की कथा। यह अध्याय शिव के गणों, जैसे नंदी, वीरभद्र, और भैरव, और उनके पराक्रम की कहानियों का संग्रह है।

शिव और उनके गणों की कथा

पिछले अध्याय में हमने भगवान शिव की विभिन्न शक्तियों के विषय में जाना। किस प्रकार उन्होंने अपनी शक्तियों से संकटों का निवारण किया और भक्तों को आशीष दिया। अब हम उनके प्रिय गणों की कथा प्रारंभ करते हैं, जो हर पल उनकी सेवा में तत्पर रहते हैं और उनकी महिमा का गुणगान करते हैं।

नंदी का जन्म और शिव भक्ति

कैलाश पर्वत पर एक अद्भुत शांति व्याप्त थी। भगवान शिव ध्यान में लीन थे, मानो समय ही थम गया हो। शिलाद नामक एक ऋषि थे, जो संतानहीन थे और भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने भगवान शिव से पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा, "हे ऋषि, मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र रूप में जन्म लूंगा।" ऋषि शिलाद अत्यंत प्रसन्न हुए।

समय आने पर, ऋषि शिलाद को एक तेजस्वी बालक मिला, जो नंदी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नंदी बचपन से ही शिव भक्ति में लीन रहता था। एक दिन ऋषि शिलाद ने नंदी से कहा, "पुत्र, गृहस्थ जीवन में प्रवेश करो।" नंदी ने उत्तर दिया, "पिताजी, मेरा जीवन तो भगवान शिव को समर्पित है। मैं उनसे बढ़कर किसी को नहीं मानता।" नंदी की भक्ति देखकर ऋषि शिलाद समझ गए कि यह बालक साधारण नहीं है।

वीरभद्र का प्राकट्य और दक्ष यज्ञ का विध्वंस

भगवान शिव की पत्नी सती, प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। दक्ष को भगवान शिव बिलकुल पसंद नहीं थे। एक बार दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं और ऋषियों को आमंत्रित किया, परंतु भगवान शिव को नहीं। सती को यह अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, आपने मेरे पति को यज्ञ में क्यों नहीं बुलाया?" दक्ष ने उत्तर दिया, "वह तो एक जोगी है, मेरा बराबरी का नहीं। उसे बुलाने की कोई आवश्यकता नहीं है।" सती को यह सुनकर बहुत क्रोध आया।

सती ने अपने पति के अपमान से क्रोधित होकर यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। जब भगवान शिव को यह समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उनके क्रोध से वीरभद्र नामक एक शक्तिशाली गण उत्पन्न हुआ। वीरभद्र ने भगवान शिव से आदेश लेकर, अपने गणों के साथ दक्ष के यज्ञ को विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया। भगवान शिव का क्रोध शांत हो जाने पर, उन्होंने दक्ष को पुनर्जीवित किया, परंतु उसका सिर बकरे के सिर से बदल दिया। भगवान शिव की कृपा से दक्ष ने अपनी भूल स्वीकार की और उनकी भक्ति करने लगा।

भैरव की उत्पत्ति और महिमा

एक बार ब्रह्मा जी ने भगवान शिव का अपमान कर दिया था। इससे भगवान शिव को बहुत क्रोध आया और उनके क्रोध से कालभैरव नामक एक भयंकर रूप उत्पन्न हुआ। कालभैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवा सिर काट दिया, जो अहंकार का प्रतीक था। कालभैरव को ब्रह्महत्या का पाप लगा और वे इस पाप से मुक्ति पाने के लिए तीनों लोकों में भटकते रहे। अंत में, उन्होंने काशी में प्रवेश किया, जहां उन्हें इस पाप से मुक्ति मिली। वहां वे काशी के कोतवाल के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जो काशी की रक्षा करते हैं।

भैरव भगवान, भगवान शिव के अत्यंत शक्तिशाली और महत्वपूर्ण गण हैं। उनकी पूजा करने से भय दूर होता है और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। वे अपने भक्तों की सभी प्रकार की बाधाओं से रक्षा करते हैं। भगवान शिव के विभिन्न गणों का वर्णन अनंत है और उनकी महिमा अपरंपार है। अब हम अगले अध्याय में लिंगम और शिव पूजा के महत्व के विषय में जानेंगे।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने नंदी, वीरभद्र और भैरव जैसे भगवान शिव के प्रमुख गणों के जन्म और उनकी महिमा के बारे में पढ़ा। इन गणों की कथाएँ हमें भक्ति, शक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का संदेश देती हैं, साथ ही यह भी बताती हैं कि अहंकार का नाश अवश्य होता है।

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