रामायण – अध्याय 6: लंका का युद्ध

लंका का युद्ध
मैत्री और खोज के अध्याय में हनुमान की वीरता और रामदूत के रूप में उनकी सफलता के बाद, सम्पूर्ण वानर सेना लंका की ओर कूच करने के लिए उत्सुक थी। राम का हृदय सीता के वियोग में व्याकुल था, परन्तु धर्म और न्याय की स्थापना का संकल्प उससे भी प्रबल था। अब लंका में राक्षसों के विनाश और सीता को वापस लाने का समय आ गया था।
सेतु निर्माण
समुद्र तट पर एकत्र हुई वानर सेना अनगिनत थी। विशाल वानरों का झुंड, उत्साही नारों से आकाश को गुंजा रहा था। राम ने समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की, परन्तु जब तीन दिन तक कोई उत्तर नहीं मिला, तो उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया, जिससे समुद्र में भूचाल आ गया। समुद्र देव भयभीत होकर प्रकट हुए और नल और नील नामक वानरों द्वारा सेतु निर्माण का उपाय बताया।
"हे राघव," समुद्र देव विनीत स्वर में बोले, "नल और नील नामक दो वानरों को आपके पिता द्वारा आशीर्वाद प्राप्त है। वे जिस पत्थर को भी छुएँगे, वह डूबेगा नहीं। उनकी सहायता से आप समुद्र पर सेतु का निर्माण कर सकते हैं।" राम ने प्रसन्न होकर नल और नील को सेतु बनाने का आदेश दिया।
वानरों ने दिन-रात अथक परिश्रम किया। कोई पर्वत से शिलाएँ उखाड़ लाता, तो कोई पेड़ों को काटकर लाता। "जय श्री राम" के नारों के साथ वानर पत्थरों को समुद्र में डालते गए। नल और नील ने पत्थरों को व्यवस्थित रूप से जमाया। पांच दिनों में सौ योजन लंबा और दस योजन चौड़ा विशाल सेतु बनकर तैयार हो गया। राम ने सेतु पर शिवलिंग स्थापित किया और विधिवत पूजा की।
रावण वध
सेतु बनकर तैयार हुआ, तो राम की सेना ने लंका की ओर प्रस्थान किया। लंका में राक्षसों की सेना भी युद्ध के लिए तैयार थी। रावण अपने अहंकार में डूबा हुआ था, उसे विश्वास था कि कोई भी उसकी लंकापुरी को भेद नहीं सकता। भीषण युद्ध हुआ। हनुमान, अंगद, नल, नील जैसे वीर वानरों ने राक्षसों की सेना को तहस-नहस कर दिया। लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया।
अंत में राम और रावण का आमना-सामना हुआ। दोनों महाबलशाली योद्धा थे। राम ने अपने दिव्य बाणों से रावण के दस सिरों को काट डाला, परन्तु हर बार वे फिर प्रकट हो जाते। राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। ब्रह्मास्त्र रावण के हृदय में लगा और उसका अंत हो गया। लंका नगरी में हाहाकार मच गया। देवताओं ने पुष्प वर्षा की और राम की जय-जयकार होने लगी।
राम का प्रभाव और कृपा राक्षसों पर भी रही। रावण जैसे अधर्मी का वध करके उन्होंने उसे भी मुक्ति प्रदान की। युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए राक्षसों को भी सद्गति मिली। राम की करुणा समस्त सृष्टि पर बरसती है, चाहे वह मित्र हो या शत्रु। विभीषण को लंका का राजा बनाया गया, उन्हें राम ने धर्म और न्याय से शासन करने का उपदेश दिया।
सीता की अग्निपरीक्षा
रावण के वध के बाद राम ने सीता से भेंट की। वर्षों के वियोग के बाद दोनों की आँखें प्रेम के आंसुओं से भर गईं। परन्तु राम ने सीता को बताया कि उन्हें अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा देनी होगी। लोक-निंदा से बचने के लिए यह आवश्यक था। सीता ने राम के आदेश को शिरोधार्य किया।
एक विशाल चिता बनाई गई। सीता ने राम का ध्यान करते हुए अग्नि में प्रवेश किया। अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए और सीता को अपनी गोद में लेकर बाहर आए। अग्निदेव ने घोषणा की कि सीता पूर्णतः पवित्र हैं और उन पर कोई कलंक नहीं है। देवताओं ने भी सीता की पवित्रता की सराहना की। राम ने सीता को स्वीकार किया।
अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में लंका पर आक्रमण, रावण का वध और सीता की अग्निपरीक्षा का वर्णन है। राम का धर्म के प्रति अटूट विश्वास और सत्य की विजय का संदेश इस अध्याय में प्रबल है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से अंततः विजय प्राप्त होती है, भले ही मार्ग कितना भी कठिन क्यों न हो। अगले अध्याय में राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटेंगे और राम का राज्याभिषेक होगा।
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