राधा कृष्ण प्रेम कथा – अध्याय 9: कृष्ण का देहत्याग

कृष्ण का देहत्याग
महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद, एक युग समाप्त हो गया था। धर्म की स्थापना तो हुई, परन्तु उस स्थापना में असंख्य प्राणों की आहुति लगी। द्वारका में एक अजीब सी शांति छाई हुई थी, मानो कोई तूफान आने से पहले की शांति हो। कृष्ण, उस शांति के बीच भी, भविष्य के संकेत देख रहे थे। उन्हें पता था, उनका समय अब निकट है।
वन में अंतिम विश्राम
द्वारका से दूर, प्रभास क्षेत्र के वन में, कृष्ण एकान्त में बैठे थे। उनकी देह वृद्धावस्था की ओर अग्रसर थी, परन्तु उनकी आँखों में वही तेज, वही करुणा व्याप्त थी। वन में शांति थी, पक्षियों का कलरव था, और शीतल हवा चल रही थी। कृष्ण ने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी सांस ली। उन्हें राधा की याद आई, उनका निष्कलंक प्रेम, उनकी अनन्त प्रतीक्षा। मन ही मन उन्होंने राधा से संवाद किया, "राधे, अब मिलन की बेला आ गई है।"
तभी, एक भील शिकारी, जरा, उस वन में भटक गया। उसने दूर से चमकती हुई एक आकृति देखी। उसे लगा कि कोई हिरण बैठा है। जरा ने बिना सोचे समझे, अपना बाण चलाया।
एक बाण, एक लीला
बाण सीधा कृष्ण के पैर के तलवे में लगा। कृष्ण ने एक गहरी सांस ली और आँखें खोलीं। जरा अपनी भूल समझ गया था। वह भयभीत होकर कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा, "हे प्रभु, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे क्षमा कीजिए।" कृष्ण ने उसे उठाया और कहा, "यह तो होनी थी, जरा। यह मेरी लीला का ही एक भाग है। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।" कृष्ण ने अपना शरीर त्यागने का निश्चय किया। इस देहत्याग के साथ ही, कलियुग का आरंभ होना था।
कृष्ण ने अपनी योगमाया से अपने प्राण त्याग दिए। उनका दिव्य तेज आकाश में विलीन हो गया। समस्त ब्रम्हांड में एक शांति छा गई, मानो स्वयं प्रकृति भी शोक मना रही हो। देवलोक से पुष्पों की वर्षा होने लगी। कृष्ण का देहत्याग, केवल देह का त्याग नहीं था, बल्कि एक युग का अंत था, और एक नए युग का आरंभ। यह उनके प्रेम, उनके धर्म, और उनकी लीला का प्रमाण था। उद्धव और अन्य प्रियजन विलाप करने लगे। कृष्ण के मार्गदर्शन और प्रेम के बिना यह संसार कैसा होगा? पर उन्हें पता था, कृष्ण सदा उनके हृदय में रहेंगे।
राधा का मिलन
जब राधा को कृष्ण के देहत्याग का समाचार मिला, तो उनका हृदय विदीर्ण हो गया। उनका जीवन, कृष्ण के प्रेम के बिना, अर्थहीन था। वह उसी वन की ओर चल पड़ीं, जहाँ कृष्ण ने अपना शरीर त्यागा था। राधा ने कृष्ण के नाम का जाप किया, और उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उनकी आत्मा, कृष्ण की आत्मा से मिलने को आतुर थी।
जैसे ही राधा कृष्ण के पार्थिव शरीर के पास पहुंचीं, उनका शरीर धीरे-धीरे तेज में बदलने लगा। राधा, कृष्ण के प्रेम में, कृष्ण में ही विलीन हो गईं। यह प्रेम की पराकाष्ठा थी, जहाँ प्रेमी और प्रेमिका एक हो जाते हैं, जहाँ कोई भेद नहीं रहता, केवल प्रेम ही शेष रहता है। यह प्रेम और धर्म की विजय थी। कृष्ण और राधा का प्रेम अमर है, और हमेशा अमर रहेगा।
अध्याय 9 का सार: इस अध्याय में कृष्ण देहत्याग करते हैं, जो एक युग का अंत और कलियुग का आरंभ दर्शाता है। राधा का कृष्ण में विलीन होना प्रेम की चरम अवस्था को प्रकट करता है, जो सिखाता है कि सच्चा प्रेम देह से परे, आत्मा का मिलन है, और प्रेम ही धर्म का आधार है।
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