राधा कृष्ण प्रेम कथा – अध्याय 1: कृष्ण का दिव्य जन्म

कृष्ण का दिव्य जन्म
पिछले युगों से धर्म का क्षय हो रहा था, अधर्म का बोलबाला बढ़ता जा रहा था। राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर कंस मथुरा का अत्याचारी शासक बन बैठा था। पृथ्वी माँ अपने पुत्रों के कष्टों से व्याकुल हो उठीं, और उन्होंने देवताओं से सहायता की गुहार लगाई।
पृथ्वी माँ की व्याकुल प्रार्थना
धरती माँ काँप रही थीं, उनके आँसुओं से नदियाँ भर रही थीं। पापों का बोझ इतना बढ़ गया था कि उनके लिए सहन करना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने देखा कि कैसे कंस के अत्याचार से प्रजा त्राहि-त्राहि कर रही है, कैसे निर्दोषों का खून बहाया जा रहा है। उनकी करुणा भरी पुकार स्वर्ग तक पहुँची। "हे देवताओं, अब और सहन नहीं होता! मेरे पुत्रों को इस कष्ट से मुक्त करो। कंस के अत्याचार से पृथ्वी को बचाओ!"
देवी अदिति ने देवताओं की ओर देखा और कहा, "पृथ्वी माँ की पुकार सुनो। अब हमें ही कुछ करना होगा। भगवान विष्णु से प्रार्थना करो, वे ही इस संकट को दूर कर सकते हैं।" इंद्र ने अपनी आँखें बंद कीं और भगवान विष्णु का ध्यान करने लगे, बाकी देवता भी उनके साथ शामिल हो गए।
देवकी और वासुदेव का कारागार
उसी समय, मथुरा में, देवकी और वासुदेव को कारागार में बंदी बनाकर रखा गया था। कंस ने भविष्यवाणी सुनी थी कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। इसलिए, उसने अपनी बहन और बहनोई को ही कैद कर लिया था। जैसे ही देवकी ने एक बच्चे को जन्म दिया, कंस उसे मार डालता था। सात शिशुओं को कंस ने निर्दयता से मार डाला था, देवकी और वासुदेव हर पल डर और दुःख में जीते थे।
वासुदेव हर पल भगवान से प्रार्थना करते थे, "हे भगवान, हमारी रक्षा करो। देवकी और हमारे निर्दोष शिशुओं को कंस के अत्याचार से बचाओ। हमें आशा है कि आप ही इस धरती पर धर्म की स्थापना करेंगे।" देवकी की आँखों में आँसू थे, पर उसका विश्वास भगवान पर अटूट था।
कृष्ण का जन्म और गोकुल गमन
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्य रात्रि में, कारागार में अद्भुत प्रकाश फैला। देवकी के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया। वासुदेव ने देखा कि बालक कृष्ण के चारों ओर दिव्य तेज है, वे चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं।
उसी क्षण, वासुदेव की बेड़ियाँ खुल गईं, कारागार के द्वार अपने आप खुल गए। भगवान कृष्ण ने वासुदेव से कहा, "मुझे गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के पास ले जाओ। वहां, मैं सुरक्षित रहूँगा।" वासुदेव ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर रखकर यमुना नदी की ओर चल पड़े। घनघोर अंधेरी रात में यमुना का जलस्तर बढ़ा हुआ था, परंतु जैसे ही वासुदेव ने बालक कृष्ण के चरण यमुना के जल में रखे, नदी ने उन्हें रास्ता दे दिया। शेषनाग स्वयं वासुदेव और बाल कृष्ण की रक्षा करते हुए उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। गोकुल पहुंचकर वासुदेव ने कृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस कारागार में आ गए।
अध्याय 1 का सार: पृथ्वी माँ की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया ताकि धर्म की स्थापना की जा सके और कंस के अत्याचार का अंत किया जा सके। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं और धर्म की रक्षा के लिए ज़रूर अवतार लेते हैं।
अगला अध्याय: गोकुल में बाल लीला.
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