राधा कृष्ण प्रेम कथा – अध्याय 6: मथुरा की यात्रा | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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राधा कृष्ण प्रेम कथा – अध्याय 6: मथुरा की यात्रा

Tilak Kathayein12 Apr 202653 views📖 1 min read
राधा कृष्ण प्रेम कथा
राधा कृष्ण प्रेम कथा का अध्याय 6 — मथुरा की यात्रा। कृष्ण बलराम के साथ मथुरा जाते हैं, जहाँ वे कंस का वध करके मथुरावासियों को उसके अत्याचारों से मुक्त करते हैं।

मथुरा की यात्रा

कंस वध की भविष्यवाणी से गोकुल में आनंद छा गया था, परन्तु नंद बाबा और यशोदा मैया का हृदय कृष्ण और बलराम के मथुरा जाने के विचार मात्र से ही व्याकुल था। अक्रूर जी के आगमन ने इस चिंता को और भी प्रबल कर दिया था। वे जानते थे कि भविष्यवाणी का सच होना अटल है, और कृष्ण का मथुरा जाना, कंस के अंत का आरंभ है।

मथुरा के लिए प्रस्थान

प्रात:काल हुआ, आकाश में लालिमा छा गयी थी। गोपियों का हृदय कृष्ण के वियोग से दुखी था। कृष्ण और बलराम, नए वस्त्रों में सजे, रथ पर सवार होने के लिए तैयार थे। यशोदा मैया ने दोनों को गले लगाया, अश्रुधारा बह रही थी। नंद बाबा ने कृष्ण के मस्तक पर तिलक लगाया और आशीर्वाद दिया। गोकुल में शोक का सागर उमड़ पड़ा था।

यशोदा मैया विलाप करते हुए बोलीं, "मेरे लाल, तुम कैसे रहोगे मेरे बिना? कौन तुम्हें माखन खिलाएगा? कौन तुम्हें मेरी याद दिलाएगा?" कृष्ण ने माँ के आँसू पोंछे, "माँ, मैं हमेशा आपके हृदय में रहूँगा। चिंता मत करो, मैं शीघ्र ही वापस आऊंगा।" बलराम ने भी यशोदा को ढांढस बंधाया और कहा कि वे कृष्ण का ध्यान रखेंगे।

कंस के पहलवानों से युद्ध

मथुरा पहुँचकर अक्रूर जी ने कृष्ण और बलराम को विश्राम करने के लिए एक स्थान पर ठहराया। फिर वे कंस के दरबार में गए और कृष्ण-बलराम के आगमन की सूचना दी। कंस क्रोध से भर गया और उसने अपने पहलवानों, चाणूर और मुष्टिक को कृष्ण-बलराम से लड़ने का आदेश दिया। अगले दिन, कृष्ण और बलराम रंगशाला में पहुँचे, जहाँ कंस ने उनके लिए कुश्ती का आयोजन किया था। चाणूर ने आते ही कृष्ण को ललकारा, "हे बालक, आओ मुझसे युद्ध करो! सुना है तुम बड़े वीर हो।"

कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा, "मैं तो बालक हूँ, चाणूर। तुमसे युद्ध कैसे कर सकता हूँ?" चाणूर ने तंज कसते हुए कहा, "तुम्हारी वीरता की कहानियाँ तो बहुत सुनी हैं, आज देखते हैं तुममें कितना दम है।" फिर युद्ध आरम्भ हुआ। कृष्ण ने चाणूर को अपनी शक्ति से चकित कर दिया। बलराम ने मुष्टिक को धूल चटाई। कंस क्रोध से पागल हो गया, उसकी योजना विफल हो रही थी। कृष्ण की लीला अपरम्पार थी, उन्होंने कंस के पहलवानों को मार गिराया, जिससे रंगशाला में भय का वातावरण छा गया।

कंस का वध

पहलवानों के मारे जाने के बाद, कृष्ण सीधे कंस की ओर बढ़े। कंस सिंहासन से उठकर भागने लगा, लेकिन कृष्ण ने उसे पकड़ लिया। कंस भय से कांप रहा था। कृष्ण ने उसे बालों से पकड़ा और सिंहासन से नीचे गिरा दिया। फिर उन्होंने कंस को मार डाला। कंस के वध से मथुरा नगरी में आनंद छा गया। प्रजा भयमुक्त हो गई थी। देवकी और वासुदेव, जो वर्षों से कारागार में बंद थे, मुक्त हो गए और उन्होंने कृष्ण को गले लगाया।

कृष्ण ने देवकी और वासुदेव को आश्वस्त किया कि अब मथुरा में धर्म की स्थापना होगी। उन्होंने उग्रसेन को पुन: सिंहासन पर बैठाया और प्रजा को न्याय दिलाने का वचन दिया। कृष्ण का तेज इतना दिव्य था कि कंस के वध के बाद भी, सभी को उनका मार्गदर्शन और सुरक्षा का अनुभव हो रहा था। यह कंस के पापों का अंत था, और धर्म की पुनर्स्थापना का आरंभ।

कृष्ण का राज्याभिषेक

कंस के वध के बाद, कृष्ण ने मथुरा को एक नई दिशा दी। उग्रसेन को सिंहासन पर पुन: स्थापित करके, उन्होंने प्रजा के दिलों में विश्वास जगाया। अब, कृष्ण को एक कुशल राजनेता के रूप में अपनी भूमिका निभानी थी। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कृष्ण किस प्रकार प्रजा के हित में कार्य करते हैं और मथुरा को एक समृद्धिशाली राज्य बनाते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कंस वध केवल एक अंत नहीं, बल्कि एक नए युग का सूत्रपात था।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में, कृष्ण और बलराम मथुरा जाते हैं, कंस के पहलवानों से लड़ते हैं, और अंत में कंस का वध करते हैं। यह धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और संसार से बुराई का नाश करते हैं।

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