राधा कृष्ण प्रेम कथा – अध्याय 5: कंस वध की भविष्यवाणी

कंस वध की भविष्यवाणी
वृंदावन में राधा और कृष्ण के प्रेम की गहराई बढ़ती जा रही थी। गोपियों का मन कृष्ण के मधुर मुस्कान और बांसुरी की धुन से मोहित था। परन्तु, दूर मथुरा में, कंस के हृदय में भय का एक काला बादल छा गया था। उसे अपनी मृत्यु का भय था, जो एक भविष्यवाणी के रूप में उसके सामने मंडरा रहा था।
भयभीत कंस
मथुरा का राजा कंस, अपनी क्रूरता और शक्ति के लिए जाना जाता था। परन्तु भविष्यवाणी ने उसे भीतर से खोखला कर दिया था। उसने सुना था कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। भय से व्याकुल होकर, उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके सभी पुत्रों को जन्म लेते ही मार डाला। हर पल उसे अपनी मृत्यु का डर सता रहा था, उसकी रातों की नींद उड़ गई थी। कंस का दरबार हमेशा भय और षड्यंत्रों से भरा रहता था। उसके चेहरे पर हमेशा क्रोध और चिंता की लकीरें दिखाई देती थीं।
"यह भविष्यवाणी मुझे सोने नहीं देगी," कंस ने अपने निजी मंत्री से कहा। "मुझे हर हाल में उस आठवें पुत्र को मारना होगा। चाहे इसके लिए मुझे पूरी पृथ्वी को ही क्यों न उजाड़ना पड़े।" उसके मंत्री ने डरते हुए कहा, "महाराज, आप जो भी आदेश देंगे, हम उसका पालन करेंगे।" कंस की आंखें क्रोध से लाल हो गईं। "मुझे तुरंत उपाय चाहिए! कोई भी उपाय!"
कृष्ण को मारने का षड्यंत्र
कंस ने कृष्ण को मारने के लिए अनेक षड्यंत्र रचे। उसने एक के बाद एक राक्षसों को वृंदावन भेजा, परन्तु हर बार वे कृष्ण की अद्भुत शक्ति के सामने हार गए। पूतना, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर - सभी कृष्ण के हाथों मारे गए। प्रत्येक राक्षस की मृत्यु के साथ, कंस का भय और भी गहरा होता गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक छोटा सा बालक इतनी शक्ति कैसे रखता है। उसने अपने सबसे विश्वासपात्र योद्धाओं को बुलाया और उन्हें कृष्ण को मारने की योजना बनाने को कहा।
हर बार जब कंस कोई नया षड्यंत्र रचता, तो कृष्ण अपनी लीलाओं से उसका जवाब देते। कृष्ण ने ना केवल राक्षसों का वध किया, बल्कि अपनी दिव्य मुस्कान और प्रेम से वृंदावन के लोगों का हृदय भी जीत लिया। जैसे-जैसे कंस के षड्यंत्र विफल होते गए, कृष्ण के प्रति लोगों का प्रेम और विश्वास बढ़ता गया। यह कृष्ण कृपा ही थी कि वृंदावन हर संकट से बच जाता था।
अक्रूर का गोकुल आगमन
अंत में, कंस ने एक और योजना बनाई। उसने अक्रूर को, जो कि यदुवंश के एक सम्मानित सदस्य थे, गोकुल भेजा। कंस ने अक्रूर को आदेश दिया कि वे कृष्ण और बलराम को मथुरा ले आएं। कंस ने सोचा कि मथुरा में वह कृष्ण को आसानी से मार देगा। अक्रूर, कंस के आदेश का पालन करने के लिए बाध्य थे, परन्तु वे मन ही मन चिंतित थे क्योंकि वे कृष्ण के भक्त थे और उन्हें मारने का विचार उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था। वे जानते थे कि कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं है, बल्कि स्वयं भगवान हैं।
अक्रूर के गोकुल आगमन से एक नई यात्रा की शुरुआत हुई। वे कृष्ण और बलराम को कंस के निमंत्रण के बारे में बताएंगे, जिससे मथुरा की यात्रा का मार्ग प्रशस्त होगा। यह यात्रा कृष्ण के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगी, जो उन्हें कंस के साथ अंतिम मुकाबले की ओर ले जाएगी। वृंदावन से मथुरा की ओर प्रस्थान, प्रेम और भक्ति की परीक्षा होगी। कृष्ण की लीलाएं अब एक नए आयाम में प्रवेश करेंगी।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में कंस के भय और कृष्ण को मारने के षड्यंत्रों का वर्णन है। कंस अपनी मृत्यु के भय से व्याकुल है और कृष्ण को मारने के लिए राक्षसों को भेजता है, परन्तु कृष्ण अपनी लीलाओं से उन्हें पराजित करते हैं। अंत में कंस अक्रूर को कृष्ण और बलराम को मथुरा लाने के लिए भेजता है, जो मथुरा की यात्रा की शुरुआत का संकेत है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि अहंकार और बुराई हमेशा डर और विनाश की ओर ले जाती है, जबकि भक्ति और प्रेम हमेशा विजय दिलाते हैं।
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