सावित्री सत्यवान कथा – अध्याय 3: वन में जीवन | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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सावित्री सत्यवान कथा – अध्याय 3: वन में जीवन

Tilak Kathayein12 Apr 202656 views📖 1 min read
सावित्री सत्यवान कथा
सावित्री सत्यवान कथा का अध्याय 3 — वन में जीवन। सावित्री और सत्यवान वन में सरल और प्रेमपूर्ण जीवन बिताते हैं, सावित्री सत्यवान की मृत्यु के दिन का बेसब्री से इंतजार करती है।

वन में जीवन

सावित्री ने जब सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, तो महाराज अश्वपति का हृदय दुख और चिंता से भर गया था। नारद मुनि के सत्यवान के अल्पायु होने की भविष्यवाणी से वे विचलित थे, परन्तु सावित्री का निश्चय अटल था। विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं, मानों कोई विधि का विधान लिख रहा हो जिसे टाला नहीं जा सकता।

विवाह और वनवास

राजमहल में आनंद और उत्सव का वातावरण था, किन्तु सावित्री के मन में भविष्य की आशंकाएं मंडरा रही थीं। उसने सत्यवान से विवाह किया और राजसी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर दिया। सत्यवान के साथ वन में निवास करने का निर्णय लिया, जहाँ वे अपने माता-पिता, जो नेत्रहीन हो चुके थे और राज्य से निष्कासित कर दिए गए थे, की सेवा करते थे। वन का जीवन कठिन था, परन्तु सावित्री के प्रेम और त्याग ने उसे स्वर्ग के समान बना दिया था। पेड़ ऊँचे और घने थे, पक्षियों का कलरव निरंतर सुनाई देता था और जंगली फूल अपनी सुंदरता बिखेरते थे।

सावित्री सत्यवान से बोली, "स्वामी, राजमहल में जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण था, पर आपके साथ इस वन में रहना मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है। आपके माता-पिता की सेवा और आपकी संगति मेरे जीवन को सार्थक बना रही है।" सत्यवान ने उत्तर दिया, "सावित्री, तुम्हारा प्रेम और त्याग अतुलनीय है। तुमने मेरे बूढ़े माता-पिता की सेवा का भार उठाया है और मुझे अपार सुख प्रदान किया है। तुम्हारा साथ मेरे लिए किसी राजसिंहासन से कम नहीं।"

सेवा और साधना

सावित्री का दिन सत्यवान और उनके माता-पिता की सेवा में बीतता था। वह सुबह जल्दी उठकर स्नान करती, भगवान की पूजा करती और सबके लिए भोजन बनाती। सत्यवान लकड़ी काटने जंगल जाते, और सावित्री उनके लिए भोजन लेकर जाती। वह दिन भर वन में जड़ी-बूटियाँ इकठ्ठा करती और बीमारों की सेवा करती। रात को वह सत्यवान को प्राचीन कहानियाँ और धार्मिक ग्रंथ पढ़कर सुनाती। सावित्री का मन सदैव ईश्वर में लगा रहता था, और वह निरंतर प्रार्थना करती रहती थी। फिर भी नारद मुनि की भविष्यवाणी उसके मन में एक कांटे की तरह खटकती रहती थी। वह हर दिन को सत्यवान के साथ बिताए हुए अंतिम दिन के रूप में देखती थी।

एक दिन सावित्री ने अपने मन में सोचा, "नारद मुनि ने कहा था कि सत्यवान की मृत्यु एक वर्ष के भीतर हो जाएगी। आज विवाह को गिने-चुने दिन ही बचे हैं। मुझे हर पल सचेत रहना होगा और सत्यवान की रक्षा करनी होगी। ईश्वर मुझे शक्ति दे कि मैं इस कठिन परीक्षा में सफल हो सकूँ।"

मृत्यु की गणना

सावित्री ने सत्यवान की मृत्यु के दिन की गणना शुरू कर दी थी। वह हर दिन को गिन-गिन कर बिता रही थी। विवाह के पश्चात्, वह हर पल सत्यवान के साथ रहती, उनकी छाया बनकर। उसने व्रत और उपवास शुरू कर दिए, और देवी-देवताओं से सत्यवान की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगी। उसके मन में डर और चिंता का सागर उमड़ रहा था, परन्तु उसने अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखा और सत्यवान को इस बात का एहसास नहीं होने दिया। वह जानती थी कि यदि सत्यवान को इस बात का पता चल गया तो वह बहुत दुखी हो जाएगा।

समय बीतता गया, और वह दुर्भाग्यशाली दिन निकट आता गया। सावित्री का हृदय डर से कांप रहा था, परन्तु उसने अपनी भक्ति और तपस्या से शक्ति प्राप्त की। उसे पता था कि उसे सत्यवान की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाना होगा, यहाँ तक कि यमराज से भी भिड़ना पड़ेगा। अगले दिन क्या होगा, यह सोचकर उसकी रातें बेचैनी से गुजरती थीं।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में सावित्री और सत्यवान के विवाह के पश्चात वनवास जीवन का वर्णन है। सावित्री सत्यवान और उनके माता-पिता की सेवा में तत्पर रहती है और धैर्य एवं प्रेम का परिचय देती है। वह मृत्यु के दिन की गणना करती है और सत्यवान की रक्षा के लिए संकल्प लेती है। इस अध्याय से हमें सेवा, त्याग और अटल आस्था का संदेश मिलता है।

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