लंका विजय कथा – अध्याय 5: हनुमान की भक्ति | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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लंका विजय कथा – अध्याय 5: हनुमान की भक्ति

Tilak Kathayein12 Apr 202657 views📖 1 min read
लंका विजय कथा
लंका विजय कथा का अध्याय 5 — हनुमान की भक्ति। राम हनुमान से मिलते हैं, हनुमान सीता की खोज में राम की मदद करने का वचन देते हैं।

हनुमान की भक्ति

सीता हरण के दुख से व्याकुल राम और लक्ष्मण दंडक वन में सीता की खोज में भटक रहे थे। वन के गहन अंधकार और सीता के वियोग ने उन्हें निराशा से भर दिया था, लेकिन उन्हें अटूट विश्वास था कि वे अवश्य ही सीता को वापस लाएंगे। तभी, विधाता के विधान से, उनकी भेंट एक ऐसे व्यक्तित्व से होने वाली थी, जिसने उनकी लंका विजय की नींव रखनी थी - हनुमान!

ऋष्यमूक पर्वत पर भेंट

ऋष्यमूक पर्वत, वानरों का आश्रय स्थल, मानो अपनी गोद में एक महत्वपूर्ण मिलन को संजोए हुए था। पर्वत की ऊँचाई से भयभीत, राम और लक्ष्मण सुग्रीव के आने वाले सैनिक दल को देखकर सतर्क हो गए। हनुमान, जो सुग्रीव के सबसे विश्वासपात्र थे, ब्राह्मण वेश में उनसे मिलने आए। उनकी वाणी में मिठास और चेहरे पर तेज था। उन्होंने दोनों राजकुमारों को प्रणाम किया, उनकी वीरता और सौंदर्य से प्रभावित हो उठे।

हनुमान ने विनम्रतापूर्वक पूछा, "हे तेजस्वी राजकुमारों, आप कौन हैं और इस दुर्गम वन में किस कारण आए हैं? आपका तेज सूर्य के समान प्रकाशमान है, फिर भी आपके मुख पर उदासी क्यों छाई हुई है? क्या मैं आपकी कोई सहायता कर सकता हूँ?" लक्ष्मण ने तब उन्हें सीता हरण की कथा सुनाई और उनसे सहायता मांगी। हनुमान राम की महिमा सुनकर भावविभोर हो गए।

सुग्रीव से मित्रता और प्रतिज्ञा

हनुमान ने राम और लक्ष्मण को अपने कंधों पर बैठाया और उन्हें सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव भी अपनी पत्नी रूमा के खो जाने और अपने भाई बाली के अत्याचारों से पीड़ित थे। हनुमान ने राम और सुग्रीव के बीच मित्रता कराई। सुग्रीव ने राम को सीता की खोज में सहायता करने का वचन दिया, और राम ने सुग्रीव को बाली से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया। अग्नि को साक्षी मानकर दोनों ने मित्रता की शपथ ली।

राम ने सुग्रीव को भरोसा दिलाया, "मित्र, बाली का पाप अब भर चुका है। मैं धर्म की स्थापना के लिए आया हूँ और अधर्म का नाश करना ही मेरा कर्तव्य है। तुम निश्चिंत रहो, मैं बाली को उसके पापों का दंड अवश्य दूंगा।" राम की वाणी में करुणा और न्याय का अद्भुत संगम था।

बाली वध और सुग्रीव का राज्याभिषेक

राम ने सुग्रीव को बाली को युद्ध के लिए ललकारने को कहा। जब बाली और सुग्रीव में भयंकर युद्ध हुआ, तो राम एक वृक्ष के पीछे छिपकर देख रहे थे। बाली की शक्ति अद्भुत थी और सुग्रीव उससे मुकाबला नहीं कर पा रहा था। तब राम ने अचूक बाण से बाली का वध कर दिया। बाली की मृत्यु से वानर सेना में शोक छा गया, लेकिन राम ने उन्हें धर्म का मार्ग समझाया।

बाली को मारकर राम ने सुग्रीव के साथ न्याय किया और धर्म की स्थापना की। बाली के वध से सुग्रीव का राज्याभिषेक का मार्ग प्रशस्त हुआ। राम की कृपा से सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने और उन्होंने सीता की खोज में अपना सहयोग देने का वचन दिया। इसी के साथ, वानर सेना के रूप में राम को एक शक्तिशाली सहयोगी मिल गया, जो लंका विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला था।

सीता की खोज की तैयारी

अब, सुग्रीव किष्किंधा के राजा बन चुके थे और वानर सेना भी राम की सेवा में तत्पर थी। हनुमान, अपनी अद्भुत शक्ति और भक्ति के साथ, सीता की खोज के लिए तैयार थे। राम को विश्वास था कि हनुमान ही सीता का पता लगा सकते हैं। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि किस प्रकार हनुमान सीता की खोज में आगे बढ़ते हैं और उन्हें लंका में ढूंढ निकालते हैं।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हनुमान की राम से भेंट, सुग्रीव से मित्रता और बाली वध का वर्णन है। हनुमान की भक्ति और राम की कृपा से लंका विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चे भक्त और न्यायप्रिय मित्र के सहयोग से बड़ी से बड़ी मुश्किलों को भी पार किया जा सकता है।

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