लंका विजय कथा – अध्याय 8: रावण से युद्ध | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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लंका विजय कथा – अध्याय 8: रावण से युद्ध

Tilak Kathayein12 Apr 202632 views📖 1 min read
लंका विजय कथा
लंका विजय कथा का अध्याय 8 — रावण से युद्ध। राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध होता है, और अंत में राम रावण का वध करते हैं।

रावण से युद्ध

सेतु बंधन के पश्चात, वानर सेना लंका के द्वार पर खड़ी थी। रावण की नगरी में भय का वातावरण था, परन्तु उसका अहंकार अभी भी अटूट था। राम अपनी सेना को संगठित करते हुए युद्ध की रणनीति बना रहे थे, ताकि धर्म की स्थापना हो सके और अन्याय का अंत हो।

अंगद का दूत बनकर लंका में प्रवेश

राम ने गंभीरता से विचार किया और अंगद को रावण के दरबार में शांति का अंतिम प्रस्ताव लेकर भेजा। अंगद, बालि पुत्र, युवा और निडर थे। स्वर्ण नगरी लंका के विशाल द्वार खुले थे, मानों किसी भयंकर तूफान को आमंत्रित कर रहे हों। अंगद ने भरी सभा में प्रवेश किया, जहाँ रावण रत्नों से जड़ित सिंहासन पर बैठा था, उसके चारों ओर उसके वीर योद्धा खड़े थे। अंगद के मुख पर तेज था, शरीर में बल और हृदय में राम का नाम।

अंगद ने निर्भीकता से कहा, "हे लंकाधिपति रावण, श्रीराम ने आपको अंतिम अवसर दिया है। सीता माता को सम्मान सहित वापस लौटा दो और क्षमा मांग लो। अन्यथा, इस नगरी का विनाश निश्चित है।" रावण क्रोध से लाल हो गया, "कौन है ये वानर जो मुझे नीति सिखाने आया है? मेरे पराक्रम के बारे में जानता नहीं! सैनिको, इसे पकड़ लो!" अंगद ने एक ही झटके में कई सैनिकों को धराशायी कर दिया और फिर अपनी शक्ति से रावण के सिंहासन को हिला दिया। "यह तो अभी शुरुआत है रावण। राम का दूत हूँ, इसलिए जीवित जा रहा हूँ। परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना।"

कुम्भकर्ण वध

अंगद के वापस लौटने के बाद, युद्ध का शंखनाद हुआ। रावण ने अपने महाबली पुत्रों और भाइयों को युद्ध में भेजा। मेघनाद, इंद्रजित, रणभूमि में तबाही मचा रहे थे। लेकिन राम की वानर सेना भी अद्भुत पराक्रम दिखा रही थी। तभी कुम्भकर्ण को जगाया गया। विशालकाय कुम्भकर्ण ने जागते ही हाहाकार मचा दिया। वह राम की सेना को निगलने लगा। वानर भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे।

राम ने देखा कि कुम्भकर्ण का आतंक बढ़ता जा रहा है। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “लक्ष्मण, अब इस राक्षस का अंत करना होगा।” लक्ष्मण ने कुम्भकर्ण पर बाणों की वर्षा कर दी, लेकिन उस राक्षस पर कोई असर नहीं हुआ। अंत में, राम स्वयं आगे आए। उनके दिव्य बाणों ने कुम्भकर्ण के अंगों को काट दिया। "राम-राम" कहते हुए कुम्भकर्ण धरती पर गिर पड़ा। वानर सेना में हर्ष की लहर दौड़ गई। यह राम की कृपा ही थी कि इतना शक्तिशाली योद्धा मारा गया, जिससे धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। राम के नाम में ही इतनी शक्ति है कि वह हर बाधा को दूर कर सकता है।

रावण वध

कुम्भकर्ण के वध के बाद, रावण शोक और क्रोध से भर गया। उसने प्रण लिया कि वह स्वयं राम का वध करेगा। रावण रथ पर सवार होकर रणभूमि में उतरा। रावण और राम के बीच भयंकर युद्ध हुआ। दोनों ही महान योद्धा थे, और उनके अस्त्र-शस्त्रों से आकाश गूंज उठा। रावण ने अपनी माया से अनेक रूप धारण किए, लेकिन राम के बाणों ने उसकी हर माया को विफल कर दिया।

अंत में, राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। वह बाण रावण के हृदय को चीरता हुआ निकल गया। रावण अपने रथ से नीचे गिर पड़ा। उसके दस सिर धरती पर लोटने लगे। लंका में हाहाकार मच गया। रावण का अंत हो गया था, और धर्म की विजय हुई थी। रावण वध के साथ ही, लंका के पापों का अंत हुआ और सीता माता की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ। अब लंका में धर्म राज्य स्थापित होगा।

अध्याय 8 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे राम ने अंगद को शांति का प्रस्ताव लेकर भेजा, कुम्भकर्ण का वध किया, और अंत में रावण का वध करके धर्म की स्थापना की। यह अध्याय हमें सिखाता है कि अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है, और सत्य की हमेशा विजय होती है।

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