रामचरितमानस – अध्याय 6: लंकाकाण्ड: युद्ध और विजय

लंकाकाण्ड: युद्ध और विजय
सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी ने माता सीता का पता लगाकर और लंका में आग लगाकर रामभक्तों को विजय का विश्वास दिलाया। अब, लंकाकाण्ड आरम्भ होता है, जहाँ धर्म और अधर्म के बीच निर्णायक युद्ध की घोषणा होती है। वानर सेना सागर पार कर लंका पहुँच चुकी है, और राम रावण के अंतिम युद्ध की घड़ी आ गई है। रावण अपनी मायावी शक्तियों और विशाल सेना के साथ खड़ा है, जबकि राम सत्य, धर्म और न्याय के प्रतीक बनकर युद्ध के मैदान में उतरते हैं।
रणभेरी का नाद
लंका की धरती युद्ध के नारों से गूंज उठी। वानर सेना ने 'जय श्री राम' के नारे लगाए, तो राक्षसों ने अपने क्रूर अट्टहासों से वातावरण को भयावह बना दिया। विशालकाय हाथी, रथ, घोड़े और पैदल सेना युद्ध के लिए सज्ज थे। राम और रावण दोनों ही अपनी-अपनी सेनाओं का नेतृत्व कर रहे थे, उनकी आँखों में विजय की प्रबल इच्छा थी। ऐसा लग रहा था मानो दो पर्वतों के बीच भीषण टक्कर होने वाली है, जिससे पूरी पृथ्वी काँप उठेगी। वानर वीर अंगद ने गर्जना करते हुए रावण को ललकारा, "अरे ओ रावण! अब तेरा अंत निकट है। तूने माता सीता का अपहरण करके महापाप किया है। अब तुझे राम के बाणों से कोई नहीं बचा सकता।"
रावण क्रोध से आग बबूला हो गया। "अरे वानर! तू क्या जानता है राम के बारे में? वह तो एक साधारण मनुष्य है। मैं, रावण, तीनों लोकों का स्वामी हूँ! मैं उसे और उसकी सेना को पल भर में नष्ट कर दूँगा!" उसने अपनी सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया, और युद्ध की भीषण ज्वाला भड़क उठी। वानरों ने भी पूरी शक्ति से राक्षसों पर धावा बोल दिया। पत्थरों, पेड़ों और नखों से वे राक्षसों का संहार करने लगे।
रावण वध
राम और रावण का युद्ध अत्यंत भयंकर था। दोनों ही महान योद्धा थे, और एक-दूसरे पर अचूक प्रहार कर रहे थे। रावण ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए अनेक रूप धारण किए, परंतु राम ने अपने दिव्य बाणों से उसकी हर चाल को विफल कर दिया। अंत में, राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। वह बाण रावण के हृदय को चीरता हुआ निकल गया, और रावण धरती पर गिर पड़ा। रावण का वध हो गया।
रावण के वध के साथ ही लंका में शोक की लहर दौड़ गई, जबकि वानर सेना में आनंद की सीमा न रही। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। राम की कृपा से धर्म की स्थापना हुई, और अधर्म का नाश हुआ। राम ने विभीषण को लंका का राज्य सौंप दिया, और न्यायपूर्ण शासन करने की प्रेरणा दी। संपूर्ण वातावरण राम नाम की महिमा से गुंजायमान हो गया।
सीता की अग्नि परीक्षा
रावण के वध के बाद, राम माता सीता को वापस लेने के लिए उत्सुक थे। किन्तु, लोकापवाद से बचने के लिए, राम ने सीता से अग्नि परीक्षा देने को कहा। देवी सीता ने बिना किसी हिचकिचाहट के अग्नि में प्रवेश किया। अग्निदेव ने स्वयं प्रकट होकर सीता की पवित्रता की गवाही दी, और बताया कि सीता निर्दोष हैं। अग्निपरीक्षा के बाद, राम ने सीता को स्वीकार किया, और उनके चेहरे पर विजय और प्रेम का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
माता सीता की अग्निपरीक्षा धर्म की स्थापना का एक और प्रमाण थी। यह दर्शाती है कि सत्य और पवित्रता हमेशा विजयी होते हैं। इसके बाद, राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान लंका से अयोध्या की और प्रस्थान करने के लिए तैयार हुए। वे जानते थे कि अयोध्या में उनका भव्य स्वागत होगा, और वर्षों बाद राज्य अभिषेक होगा। अगला अध्याय, उत्तरकाण्ड, राम के राज्याभिषेक और उनके आदर्श शासन की कहानी बताएगा।
अध्याय 6 का सार: लंकाकाण्ड में राम और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अंततः रावण का वध हुआ। माता सीता ने अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्निपरीक्षा दी, और राम ने उन्हें स्वीकार किया। इस अध्याय से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य और धर्म हमेशा विजयी होते हैं, और ईश्वर हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
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