रामचरितमानस – अध्याय 2: अयोध्याकाण्ड: राजसी हानि

अयोध्याकाण्ड: राजसी हानि
बालकाण्ड में हमने भगवान श्री राम के बाल रूप एवं उनके दिव्य विवाह का वर्णन सुना। अब हम आगे बढ़ते हैं अयोध्याकाण्ड की ओर, जहाँ अयोध्या में आनंद एवं उत्साह का वातावरण पल भर में शोक में बदल जाता है। यह अध्याय हमें नियति की अटलता और मानवीय भावनाओं की जटिलता का परिचय कराता है।
राज्याभिषेक की तैयारी
अयोध्या नगरी में उत्सव का माहौल था। महाराज दशरथ ने वृद्धावस्था को देखते हुए युवराज राम का राज्याभिषेक करने का निर्णय लिया था। पूरी नगरी को दीपों से सजाया गया था, रंगोली बनाई गई थी, और हर घर में मंगल गीत गाए जा रहे थे। सभी नागरिक अपने प्रिय राजकुमार को राजा के रूप में देखने के लिए उत्सुक थे। सरयू नदी के तट पर विशेष पूजा-अर्चना की जा रही थी और ब्राह्मण राजकुमार राम के कल्याण के लिए मंत्रोच्चारण कर रहे थे। वातावरण में भक्ति, प्रेम और उत्साह का अद्भुत संगम था।
“आज राम राजा बनेंगे! कितना सुखद दिन है!” एक वृद्धा ने कहा। दूसरी ने उत्तर दिया, “हाँ, राम तो साक्षात धर्म स्वरूप हैं। उनके राजा बनने से अयोध्या का कल्याण होगा।” राजकुमार भरत और शत्रुघ्न भी इस शुभ अवसर पर अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देने के लिए ननिहाल से अयोध्या लौट आए थे।
कैकेयी का वरदान
जैसे ही राज्याभिषेक की तैयारियां चरम पर थीं, मंथरा नाम की दासी ने रानी कैकेयी के मन में विष घोलना शुरू कर दिया। उसने कैकेयी को याद दिलाया कि महाराज दशरथ ने उसे दो वरदान दिए थे, जिनका उपयोग वह अपने पुत्र भरत को राजा बनाने और राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास भेजने के लिए कर सकती है। कैकेयी, मंथरा के कुटिल विचारों से प्रभावित हो गई और उसने महाराज दशरथ से अपने वरदान मांगने का निर्णय लिया। जब महाराज दशरथ, कैकेयी के कक्ष में पहुंचे, तो उन्होंने उसे उदास और क्रोधित पाया।
महाराज दशरथ ने व्याकुल होकर पूछा, "कैकेयी, क्या हुआ? तुम इतनी उदास क्यों हो? क्या मैं तुम्हारी कोई सहायता कर सकता हूँ?" कैकेयी ने कठोर स्वर में उत्तर दिया, "मुझे अपने दोनों वरदान चाहिए महाराज। पहला, भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाए और दूसरा, राम को चौदह वर्ष के लिए वनवास भेजा जाए।" महाराज दशरथ यह सुनकर मूर्छित हो गए।
राम का वनवास
जब राम को कैकेयी के वरदान और अपने पिता की विवशता का पता चला, तो उन्होंने बिना किसी विरोध के वनवास जाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म समझा। माता कौशल्या और लक्ष्मण ने राम को रोकने का प्रयास किया, लेकिन राम अपने निश्चय पर अडिग रहे। सीता भी राम के साथ वन जाने के लिए तैयार हो गईं। राम, सीता और लक्ष्मण ने तपस्वी वस्त्र धारण किए और अयोध्यावासियों से विदा ली। उनके वनवास के समाचार से पूरी अयोध्या शोक में डूब गई।
राम ने अपनी माता से कहा, "माता, आप दुखी न हों। मैं अपने पिता की आज्ञा का पालन करने जा रहा हूँ। चौदह वर्ष बाद मैं अवश्य लौटूँगा।" सीता ने कहा, "मैं आपके साथ वन में रहूंगी, स्वामी। आपके बिना अयोध्या मेरे लिए सूनी है।" लक्ष्मण ने धनुष उठाते हुए कहा, "मैं आपकी सेवा में सदैव तत्पर रहूंगा, भैया। वन में मैं आपकी रक्षा करूंगा।"
अध्याय 2 का समापन
राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास के साथ ही अयोध्या का सुख, दुःख में परिवर्तित हो गया। महाराज दशरथ पुत्र वियोग में प्राण त्याग देते हैं। भरत ननिहाल से लौटकर स्थिति समझते हैं और राम को वापस लाने वन जाते हैं। परन्तु राम, पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास पूरा करने का निश्चय करते है, जिसका अनुसरण अगले अध्याय, अरण्यकाण्ड: वनवास जीवन में होगा। यहाँ से राम के वनवास जीवन का प्रारम्भ होता है और वे अनेक राक्षसों का वध करते हुए ऋषि-मुनियों की रक्षा करते हैं।
अध्याय 2 का सार: अयोध्याकाण्ड में राम के राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी के वरदान और राम के वनवास का वर्णन है। यह अध्याय हमें धर्म के पालन, वचनबद्धता और नियति की शक्ति का बोध कराता है। हमें सिखाता है कि हमें हर परिस्थिति में धैर्य और साहस बनाए रखना चाहिए।
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