नरसिंह अवतार कथा – अध्याय 7: शांति स्थापित, धर्म स्थापित
शांति स्थापित, धर्म स्थापित
हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात, नरसिंह भगवान का क्रोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उनका विकराल रूप देवताओं और गन्धर्वों को भी भयभीत कर रहा था। किसी में इतनी शक्ति नहीं थी कि उनके समीप जाकर उन्हें शांत कर सके।
नरसिंह का क्रोध और देवताओं की व्याकुलता
नरसिंह देव, अपनी गर्जना से तीनों लोकों को कंपा रहे थे। उनकी आँखें क्रोध से लाल थीं और उनके नाखून अब भी हिरण्यकशिपु के रक्त से सने थे। देवता भयभीत होकर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और विनती करने लगे, "हे पितामह! नरसिंह भगवान के क्रोध से सृष्टि में प्रलय आने का भय है। कृपया आप ही कोई उपाय करें।" ब्रह्मा जी, देवताओं को साथ लेकर भगवान नरसिंह के पास गए, परन्तु उनके तेज को सहन कर पाना कठिन था।
ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे भगवान, आप ही इस सृष्टि के रक्षक हैं। आपका यह क्रोध तीनों लोकों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। कृपा करके शांत हो जाइये। अपने भक्तों पर दया कीजिये।" परन्तु नरसिंह देव का क्रोध शांत नहीं हुआ।
प्रह्लाद की स्तुति
ब्रह्मा जी ने तब प्रह्लाद को आगे आने का आदेश दिया। प्रह्लाद, जिसने अपने पिता के अत्याचारों को सहन किया था और भगवान विष्णु पर अटूट विश्वास रखा था, धीरे-धीरे नरसिंह भगवान के पास पहुंचा। उसने भय और भक्ति से कांपते हुए नरसिंह देव के चरणों में प्रणाम किया। प्रह्लाद की आँखों में आंसू थे, परन्तु उसके मुख पर शांति और समर्पण का भाव था। फिर उसने नरसिंह देव की स्तुति आरम्भ की। उसने भगवान के गुणों का वर्णन करते हुए अनेक श्लोक गाए, जिसमे भगवान की दया, करुणा और भक्तों के प्रति प्रेम का बखान था।
"हे भगवान, आप आदि हैं, आप अनंत हैं। यह सृष्टि आपकी ही लीला है। मैं एक तुच्छ बालक आपके चरणों में शरण लेता हूँ। मेरे पिता ने आपके भक्तों पर अत्याचार किया, परन्तु मैं जानता हूँ कि आपका न्याय सर्वोपरि है। कृपा कर शांत हो जाइये," प्रह्लाद ने कहा, अपने हृदय की गहराई से स्तुति करते हुए। नरसिंह भगवान का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा। प्रह्लाद की भक्ति और प्रेम से भरा हृदय देखकर, उनकी क्रूरता पिघल गई। उन्होंने प्रह्लाद को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।
प्रह्लाद का राज्याभिषेक और धर्म की स्थापना
नरसिंह भगवान के क्रोध के शांत होने के बाद, देवताओं ने राहत की सांस ली। उन्होंने प्रह्लाद को सिंहासन पर बैठाया और उसका राज्याभिषेक किया। प्रह्लाद ने एक धर्मात्मा राजा के रूप में शासन किया। उसने प्रजा के सुख और कल्याण के लिए कार्य किया और विष्णु भक्ति का प्रचार किया। उसके राज्य में सुख, शांति और समृद्धि का वास था। अत्याचार और अन्याय का अंत हो गया और धर्म की स्थापना हुई।
नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया कि उसका वंश हमेशा विष्णु भक्ति में लीन रहेगा और धर्म का पालन करेगा। उन्होंने प्रह्लाद को ज्ञान दिया कि कैसे एक राजा को अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए और धर्म का पालन करना चाहिए। विष्णु भगवान की कृपा से, धरती पर एक नया युग आरम्भ हुआ, जिसमे सत्य, प्रेम और न्याय का बोलबाला था।
अध्याय 7 का सार: इस अध्याय में नरसिंह भगवान के क्रोध के शांत होने, प्रह्लाद द्वारा उनकी स्तुति और प्रह्लाद के राज्याभिषेक का वर्णन है। इसका आध्यात्मिक सार यह है कि भक्ति और प्रेम सबसे बड़े क्रोध को भी शांत कर सकते हैं और धर्म की स्थापना कर सकते हैं। इस कथा से हमें यह भी सीख मिलती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें सत्य के मार्ग पर चलाते हैं।
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