नरसिंह अवतार कथा – अध्याय 5: भगवान् का प्रश्न
भगवान् का प्रश्न
होलिका की अग्नि में प्रह्लाद की अद्भुत रक्षा के बाद, हिरण्यकशिपु का क्रोध और भी भड़क उठा। वह समझ नहीं पा रहा था कि एक छोटा बालक इतनी दृढ़ता से विष्णु का नाम कैसे ले सकता है और हर बार मृत्यु को कैसे हरा सकता है। असुरराज के दरबार में अब भय और क्रोध का मिश्रण था, सभी उस बालक की अद्भुत भक्ति से चकित थे, जिसने अग्नि को भी शीतल कर दिया था।
दरबार में क्रोध
स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हिरण्यकशिपु का मुख क्रोध से लाल हो रहा था। उसकी आँखें अंगारे की तरह जल रही थीं और उसकी मुट्ठियां कसकर बंधी हुई थीं। दरबारियों के बीच सन्नाटा छाया हुआ था, हर कोई अनिष्ट की आशंका से डरा हुआ था। हिरण्यकशिपु ने गहरी सांस ली और फिर गर्जना करते हुए प्रह्लाद को अपने समक्ष लाने का आदेश दिया। प्रह्लाद को डर नहीं लग रहा था, बल्कि वो मुस्कुरा रहा था।
"हे मूर्ख बालक!" हिरण्यकशिपु ने कहा, "क्या तुम्हें अपने पिता का भय नहीं है? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि मैं इस ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली राजा हूँ? फिर भी तुम उस तुच्छ विष्णु का नाम जपते रहते हो! क्या तुम्हें मृत्यु का भय नहीं है?" प्रह्लाद ने शांत भाव से उत्तर दिया, "पिताजी, मृत्यु से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। आत्मा अमर है और विष्णु ही सर्वशक्तिमान हैं। भय तो अज्ञान का प्रतीक है।"
विष्णु की सर्वव्यापकता
हिरण्यकशिपु का क्रोध और भी बढ़ गया। उसने प्रह्लाद से पूछा, "क्या तुम्हारा विष्णु हर जगह है? क्या वह इस महल में भी है? क्या वह इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने निर्भयता से उत्तर दिया, "हाँ पिताजी, विष्णु सर्वव्यापी हैं। वे हर जगह विद्यमान हैं - कण-कण में, हर दिशा में, हर वस्तु में।" प्रह्लाद की इस बात को सुनकर हिरण्यकशिपु के क्रोध की सीमा न रही। उसने अपने सिंहासन से उठकर एक विशाल गदा उठाई।
हिरण्यकशिपु ने गदा को घुमाते हुए पूरे बल से उस खंभे पर प्रहार किया जिस ओर प्रह्लाद ने इशारा किया था। खंभे के टूटने की भयानक आवाज पूरे महल में गूंज उठी। दरबारी डर से कांप उठे। हिरण्यकशिपु क्रोध से चीखा, "यदि तुम्हारा विष्णु इस खंभे में है, तो उसे बाहर आने दो और मुझे पराजित करे!" उसी क्षण, खंभे के टूटने के साथ ही एक भयानक गर्जना हुई और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड काँप उठा। विष्णु की माया अपार और दिव्य है, यह हर परिस्थिति में अपने भक्त की रक्षा करती है। प्रह्लाद का विश्वास अटल था, और विष्णु उसकी भक्ति के वशीभूत थे।
प्रलय की आशंका
खंभे के टूटने से जो प्रकाश और ध्वनि उत्पन्न हुई, वह प्रलय के समान थी। हिरण्यकशिपु और उसके दरबारी भय से स्तब्ध खड़े थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या होने वाला है। धरती हिलने लगी और आकाश में विचित्र रंग दिखाई देने लगे। अब समय आ गया था अन्याय और अहंकार के अंत का और धर्म की स्थापना का। अगले अध्याय में हम देखेंगे भगवान् विष्णु का अद्भुत नरसिंह अवतार।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से विष्णु के बारे में प्रश्न किए और प्रह्लाद ने निडरता से विष्णु की सर्वव्यापकता का उत्तर दिया। यह दिखाता है कि सत्य और भक्ति सदैव अजेय होती हैं और भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं।
संबंधित लेख

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 5: भक्ति का फल और सीख
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 5 — भक्ति का फल और सीख। यह अंतिम अध्याय बताता है कि कालाष्टमी व्रत रखने से प्राप्त होने वाले परिणाम और इससे मिली सीख क्या है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 4: दिव्य हस्तक्षेप और आशीर्वाद
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 4 — दिव्य हस्तक्षेप और आशीर्वाद। अध्याय चार में, भगवान भैरव भक्त की अटूट भक्ति से प्रसन्न होते हैं और उसे अपना आशीर्वाद देते हैं।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 3: परीक्षा और कष्टों का सामना
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 3 — परीक्षा और कष्टों का सामना। इस अध्याय में, भक्त को भगवान की कृपा प्राप्त करने से पहले कई बाधाओं और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 2: भक्त की विनती और भक्ति
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 2 — भक्त की विनती और भक्ति। इस अध्याय में, एक भक्त की सच्ची भक्ति और भगवान भैरव से उसकी पुकार का वर्णन किया गया है।

कालाष्टमी व्रत – अध्याय 1: कालाष्टमी व्रत का उद्भव
कालाष्टमी व्रत का अध्याय 1 — कालाष्टमी व्रत का उद्भव। यह अध्याय बताता है कि कालाष्टमी व्रत का जन्म कैसे हुआ और इसका महत्व क्या है।

Om Jai Jagdish Hare | ॐ जय जगदीश हरे
ॐ जय जगदीश हरे आरती भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसकी सरल विधि और भक्तिपूर्ण गायन से आध्यात्मिक शांति मिलती है। यह आरती घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।