वराह अवतार कथा – अध्याय 2: प्रार्थना और प्राकट्य
प्रार्थना और प्राकट्य
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी को क्षीरसागर में डुबोने से समस्त ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया था। ब्रह्माजी की सभा में ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस संकट से मुक्ति पाने का उपाय ढूंढ रहे थे, परंतु कोई भी मार्ग स्पष्ट नहीं दिख रहा था। पृथ्वी माता की करुण पुकार और देवताओं की चिंता से वातावरण गंभीर हो गया था। अब आगे की कथा में देखें कि कैसे भगवान विष्णु इस विकट परिस्थिति में प्रकट होते हैं और ब्रह्माण्ड को संकट से उबारते हैं।
ब्रह्माजी की व्याकुलता
ब्रह्माजी अपने सिंहासन पर बैठे, अत्यंत व्याकुल थे। उनकी चारो दिशाओं में फैली दृष्टि निराशा से भरी हुई थी। उनके मानस पटल पर केवल पृथ्वी माता की दुर्दशा का दृश्य घूम रहा था। सृष्टि के रचयिता होने के नाते उनके हृदय में अपने दायित्व का भार अनुभव हो रहा था, और वह यह सोचकर चिंतित थे कि उनसे सृजन में कहीं कोई भूल तो नहीं हो गई। समस्त देवता, ऋषि-मुनि और गंधर्व उनकी ओर आशा भरी नज़रों से देख रहे थे, मानो उनकी व्याकुलता को शांत करने के लिए किसी दिव्य वाणी की प्रतीक्षा कर रहे हों। वेद मंत्रों का उच्चारण भी उस समय शांत हो गया, क्योंकि हर कोई उस अनिष्ट की आशंका से भयभीत था जो ब्रह्माण्ड पर मंडरा रहा था।
ब्रह्माजी ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "हे नारायण, हे परमपिता, हमें मार्गदर्शन दीजिए! यह हिरण्याक्ष अपनी शक्ति के मद में अंधा होकर सम्पूर्ण सृष्टि को नष्ट करने पर तुला है। पृथ्वी माता जल में डूबी हुई है, और हम सब असहाय हैं। हमारी बुद्धि काम नहीं कर रही। कृपया अपनी माया से हमें मुक्ति का मार्ग दिखाइए।" उनके मुख से निकले ये शब्द प्रार्थना बनकर पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज उठे।
विष्णु का वराह रूप धारण
जैसे ही ब्रह्माजी की प्रार्थना समाप्त हुई, क्षीरसागर की गहराई में एक अद्भुत प्रकाश उत्पन्न हुआ। यह प्रकाश इतना तीव्र था कि देवताओं की आँखें चौंधिया गईं। फिर, उस प्रकाश के बीच से एक विशाल वराह (सूअर) का रूप प्रकट हुआ। उस वराह का शरीर पर्वत के समान विशाल था, और उसकी गर्जना से तीनों लोक कांप उठे। उसके दाँत तीखे थे, और उसकी दृष्टि में प्रचंड तेज था। यह भगवान विष्णु का वराह अवतार था, जो पृथ्वी को बचाने के लिए प्रकट हुए थे।
भगवान विष्णु का यह रूप अद्भुत और शक्तिशाली था। वराह अवतार में उन्होंने अपनी लीला से यह संदेश दिया कि जब धर्म की हानि होती है, तब वे किसी भी रूप में प्रकट होकर उसकी रक्षा करते हैं। उनकी कृपा से देवताओं और ऋषि-मुनियों में आशा का संचार हुआ। सभी ने मिलकर "विष्णु भगवान की जय!" का नारा लगाया, जिससे पूरी सृष्टि गुंजायमान हो गई। विष्णु की शक्ति और करुणा का अनुभव कर सभी आश्वस्त हो गए कि अब पृथ्वी सुरक्षित है।
देवताओं का विस्मय
भगवान विष्णु के वराह रूप को देखकर देवता विस्मय से भर गए। उन्होंने पहले कभी भगवान का ऐसा रूप नहीं देखा था। वराह अवतार की दिव्यता और पराक्रम ने उन्हें चकित कर दिया। वे समझ गए कि भगवान विष्णु ही इस संकट से मुक्ति दिला सकते हैं। वे सभी हाथ जोड़कर भगवान वराह की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान वराह ने क्षीरसागर में छलांग लगा दी, पृथ्वी को खोजने के लिए। अब अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे भगवान वराह हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी का उद्धार करते हैं।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे पृथ्वी के संकट में ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और विष्णु ने वराह अवतार धारण किया। इस रूप को देखकर देवता विस्मय से भर गए और स्तुति करने लगे। यह अध्याय हमें सिखाता है कि जब हम असहाय महसूस करते हैं, तो सच्चे मन से की गई प्रार्थना हमेशा सुनी जाती है और भगवान किसी न किसी रूप में हमारी सहायता के लिए अवश्य आते हैं।
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