वराह अवतार कथा – अध्याय 1: अवतीर्ण का आरम्भ
अवतीर्ण का आरम्भ
युगों पहले, जब सत्य और धर्म का मार्ग क्षीण होने लगा था, और धरती पापों से बोझिल हो रही थी, तब एक भयानक असुर का उदय हुआ। उसका नाम था हिरण्याक्ष। उसकी शक्ति और अत्याचार की कहानी स्वर्ग और धरती के हर कोने में फैल गई थी।
हिरण्याक्ष का साम्राज्य
हिरण्याक्ष का आतंक तीनों लोकों में छा गया था। उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से भगा दिया था और पृथ्वी पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। उसकी क्रूरता की कोई सीमा नहीं थी। वह निर्दोषों को मारता, ऋषियों को सताता और यज्ञों को भंग करता था। धरती पर हाहाकार मचा हुआ था, मानो प्रलय का आगमन हो गया हो। भय के कारण लोगों ने भगवान का नाम लेना भी छोड़ दिया था। हर तरफ निराशा और अंधकार छाया हुआ था। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे धर्म पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।
"यह धरती अब केवल मेरी है! देव और मनुष्य सब मेरे दास हैं!" हिरण्याक्ष गर्जा। "जो मेरे विरुद्ध खड़ा होगा, उसे मृत्युदंड मिलेगा।" उसका अहंकार इतना बढ़ गया था कि वह स्वयं को ही भगवान समझने लगा था। उसे लगता था कि उसकी शक्ति के आगे कोई नहीं टिक सकता।
पृथ्वी का विलाप
हिरण्याक्ष के अत्याचारों से त्रस्त पृथ्वी माता अब और सहन नहीं कर पाईं। पापों का बोझ इतना बढ़ गया था कि उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। धीरे-धीरे पृथ्वी रसातल की ओर जाने लगी। पहाड़ों, नदियों और वनों सब कुछ डूबने लगा। देवताओं और मनुष्यों की करुण पुकारें निरर्थक सिद्ध हो रही थीं। पृथ्वी कांप रही थी और अपने विनाश की प्रतीक्षा कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि धरती माता अपने बच्चों को बचाने में असमर्थ हैं।
भगवान विष्णु, जो सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, पृथ्वी माता की पीड़ा को अनदेखा नहीं कर सकते थे। उन्होंने अपने मन में ठान लिया कि वे अवश्य ही धरती को इस संकट से उबारेंगे। उनके हृदय में करुणा और न्याय की भावना प्रबल हो उठी। उन्होंने अपने संकल्प को दृढ़ किया और अवतार लेने का निश्चय किया।
ब्रह्माजी की स्तुति
जब पृथ्वी रसातल में जा रही थी, तब ब्रह्माजी ने देवताओं और ऋषियों के साथ मिलकर भगवान विष्णु की स्तुति करना आरम्भ किया। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे धरती को हिरण्याक्ष के अत्याचार से बचाएं। "हे विष्णु, आप ही इस सृष्टि के पालनहार हैं। अब आप ही इस धरती को बचा सकते हैं," ब्रह्माजी ने कहा। "आपके सिवा हमारी कोई आशा नहीं है।" उनकी स्तुति सुनकर देवताओं और ऋषियों की आंखों में आशा की किरण दिखाई दी। वे सब मिलकर भगवान विष्णु की कृपा की प्रतीक्षा करने लगे। यही वह कठिन घड़ी थी जब भगवान विष्णु के वराह अवतार का प्राकट्य होना निश्चित था। आगे की कथा प्रार्थना और प्राकट्य के विषय में होगी।
अध्याय 1 का सार: इस अध्याय में हिरण्याक्ष के आतंक और उसके कारण पृथ्वी के रसातल में जाने का वर्णन है। ब्रह्माजी और अन्य देवताओं द्वारा विष्णु स्तुति यह दर्शाती है कि जब धर्म का नाश होने लगता है, तो भगवान अपने भक्तों की प्रार्थना सुनकर अवतार लेते हैं और जगत की रक्षा करते हैं।
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