शीतला माता कथा – अध्याय 3: विनम्रता और आराधना | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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शीतला माता कथा – अध्याय 3: विनम्रता और आराधना

Tilak Kathayein13 Apr 202641 views📖 1 min read
शीतला माता कथा
शीतला माता कथा का अध्याय 3 — विनम्रता और आराधना। ग्रामवासी अपनी भूल का एहसास करते हैं और शीतला माता की आराधना करते हैं।

विनम्रता और आराधना

इंद्र के प्रकोप से ग्राम में हाहाकार मच गया था। शीतला माता के कोप से चेचक का भयंकर रोग फैल गया। ग्रामवासी भयभीत और चिंतित थे, उन्हें अपनी भूल का एहसास हो रहा था कि उन्होंने माता के स्वरूप को पहचानने में भूल की। अब वे पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे।

पश्चात्ताप की अग्नि

चारों ओर चीख-पुकार मची हुई थी। बच्चे, बूढ़े, जवान - सभी चेचक के लाल दानों से कराह रहे थे। पहले तो लोगों ने इस रोग को मामूली समझा था, परन्तु अब जब इसने भयंकर रूप ले लिया, तो उन्हें अपनी मूर्खता का पता चला। गाँव की गलियां सूनी पड़ी थीं, घरों से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। लोगों के हृदय भय और शोक से भरे हुए थे। आकाश में सूर्य भी मानो उदास हो गया था, उसकी किरणें तेजहीन लग रही थीं।

एक वृद्ध महिला, जो अपनी पोती को गोद में लिए बैठी थी, रोते हुए बोली, "हे माता, हमसे बड़ी भूल हुई। हमने तुम्हे पहचाना नहीं। हमारी अज्ञानता को क्षमा करो। अब हम क्या करें? कैसे इस रोग से मुक्ति पाएँ?" उसकी पोती बुखार से तप रही थी। उसके चेहरे पर लाल दाने उभर आए थे।

शीतला माता की स्तुति

गाँव के कुछ बुज़ुर्ग इकट्ठे हुए और उन्होंने निर्णय लिया कि वे शीतला माता की आराधना करेंगे और उनसे क्षमा याचना करेंगे। उन्होंने एक शांत स्थान पर शीतला माता की प्रतिमा स्थापित की। सभी ग्रामवासी हाथ जोड़कर प्रतिमा के सामने बैठ गए। पंडित जी ने मंत्रोच्चारण शुरू किया और सब मिलकर माता की स्तुति करने लगे। "ॐ ह्रीं श्रीं शीतलाये नमः" मंत्र से पूरा गाँव गूंज उठा।

ग्रामवासियों ने माता की स्तुति में गीत गाए, उनकी महिमा का वर्णन किया और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। "हे करुणामयी माँ, हम अज्ञानी हैं, नासमझ हैं। हमें अपनी शरण में लो। हमें क्षमा करो। हम भविष्य में कभी ऐसा अपराध नहीं करेंगे। हम हमेशा तुम्हारा सम्मान करेंगे और तुम्हारी पूजा करेंगे।" स्तुति करते-करते कई लोगों की आँखों में आँसू आ गए, उनका हृदय पश्चात्ताप से भर गया था। माता शीतला की कृपा से कुछ रोगियों में सुधार दिखने लगा।

बासी भोजन का अर्पण

यह जानकर कि शीतला माता को ठंडा, बासी भोजन प्रिय है, लोगों ने रात का बचा हुआ भोजन इकट्ठा किया। खीर, पूरी, सब्ज़ी - जो कुछ भी उनके पास था, उन्होंने उसे माता को नैवेद्य के रूप में अर्पित किया। उन्होंने माता से प्रार्थना की कि वे इस प्रसाद को स्वीकार करें और उनके ग्राम को रोग मुक्त करें। उन्होंने संकल्प लिया कि वे हर वर्ष शीतला अष्टमी के दिन माता की पूजा करेंगे और उन्हें बासी भोजन ही अर्पित करेंगे।

नैवेद्य अर्पण करने के बाद, ग्रामवासियों ने उस बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। उनके मन में अब श्रद्धा और विश्वास था, डर और निराशा नहीं। उन्हें विश्वास था कि माता अवश्य ही उनकी प्रार्थना सुनेंगी और उन्हें क्षमा कर देंगी। माता शीतला की शक्ति से गाँव में धीरे-धीरे शांति और स्वास्थ्य वापस आने लगा। अब आवश्यकता थी माता के पूर्ण क्षमा और आशीर्वाद की, जिसके लिए गाँव वाले व्याकुल थे। अगला अध्याय बताएगा कि क्या माता अपने भक्तों को क्षमा कर पाएंगी?

अध्याय 3 का सार: इंद्र के प्रकोप के बाद, ग्रामवासियों ने अपनी भूल का अनुभव किया और शीतला माता की पूजा-अर्चना आरंभ की। उन्होंने बासी भोजन का नैवेद्य अर्पित किया और क्षमा याचना की। इस अध्याय में विनम्रता और आराधना के महत्व को दर्शाया गया है, जो क्षमा प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

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