शीतला माता कथा – अध्याय 2: इंद्र का अभिमान और प्रकोप

इंद्र का अभिमान और प्रकोप
पिछले अध्याय में हमने शीतला माता के अद्भुत प्राकट्य के बारे में जाना। उनके जन्म का उद्देश्य ही संसार को रोगों से मुक्ति दिलाना था। किन्तु भाग्य को तो कुछ और ही मंज़ूर था। देवताओं में श्रेष्ठ इंद्र, अपने अधिकार और बल के मद में चूर, इस सत्य से अनभिज्ञ, भयंकर भूल करने वाले थे, जिसके परिणाम स्वरूप धरती पर घोर संकट आने वाला था।
इंद्र का दर्प
स्वर्ग में देवतागण अपने-अपने कार्यों में लीन थे। इंद्र, अपने सिंहासन पर विराजमान, अपनी शक्ति का गुणगान सुन रहे थे। उनके मुख पर दर्प का भाव स्पष्ट झलक रहा था। वह स्वयं को सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण मानते थे, वर्षा के देवता होने के कारण उनका अभिमान और भी बढ़ गया था। उन्हें यह लगने लगा था कि पृथ्वी पर जीवन केवल उन्हीं की कृपा से चल रहा है। बादलों की गर्जना और बिजली की चमक के साथ वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहते, मानो सबको यह जता रहे हों कि उनका आदेश ही सर्वोपरि है। उनके मन में यह विचार आने लगा कि पृथ्वी लोक के लोग उनकी पूजा उचित रूप से नहीं करते।
"मेरा सम्मान जितना होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा। ये पृथ्वीवासी अपनी फसलें उगाते हैं और देवताओं को भूल जाते हैं। वे मेरे महत्व को नहीं समझते," इंद्र ने अपने मन में सोचा। "मैं उन्हें दिखाता हूँ कि वर्षा के बिना उनका क्या हाल होता है। मैं वर्षा रोक दूंगा। तब वे समझेंगे कि इंद्र की कृपा कितनी आवश्यक है।"
ग्राम में महामारी
इंद्र के क्रोध के कारण पृथ्वी पर वर्षा रुक गई। नदियाँ सूखने लगीं, खेत सूख गए और धरती में दरारें पड़ने लगीं। अन्न का अभाव होने लगा और लोग भूख से व्याकुल होने लगे। तभी एक और संकट आ खड़ा हुआ - बीमारियाँ फैलने लगीं। चेचक, खसरा और अन्य रोगों ने गाँव में अपना डेरा जमा लिया। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी इस महामारी की चपेट में आने लगे। गाँव में चीत्कार और विलाप का माहौल छा गया। वैद्य और हकीम भी बेबस थे, क्योंकि उनके पास इन रोगों का कोई इलाज नहीं था। लोग भयभीत थे और मृत्यु का साया हर तरफ मंडरा रहा था।
शीतला माता, अपने दिव्य रूप में, यह सब देख रही थीं। उनका हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने अपने भक्तों की पीड़ा को महसूस किया और उन्हें बचाने का निर्णय लिया। शीतला माता ने अपने प्रभाव से रोगों को शांत करने का प्रयास किया, परन्तु इंद्र का कोप इतना प्रबल था कि माता के लिए भी तत्काल सब कुछ ठीक करना संभव नहीं था। फिर भी उन्होंने अपनी शक्ति से लोगों में रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान की और उन्हें धैर्य रखने के लिए प्रेरित किया।
माता का प्रकोप
महामारी से त्रस्त गाँव में एक रात, शीतला माता एक साधारण स्त्री के रूप में प्रकट हुईं। उनके चेहरे पर करुणा और आँखों में तेज था। उन्होंने गाँव के लोगों को एकत्रित किया और कहा, "यह प्रकोप इंद्र के अभिमान के कारण आया है। उन्होंने वर्षा रोक दी है और तुम सब बीमारियों से त्रस्त हो। एकमात्र उपाय है, इंद्र की आराधना करना और उनसे क्षमा मांगना। साथ ही, मेरी भी आराधना करो, मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी।" उनकी वाणी में दिव्य शक्ति थी, जिससे लोगों में आशा का संचार हुआ।
शीतला माता ने आगे कहा, "जो मुझ पर विश्वास रखेगा और मेरी पूजा सच्चे मन से करेगा, मैं उसकी रक्षा करूंगी। घबराओ मत, धैर्य रखो। यह समय भी बीत जाएगा।" माता के वचन सुनकर लोगों के मन में थोड़ा सा ढांढस बंधा। उन्होंने माता के बताए अनुसार इंद्र को प्रसन्न करने और उनसे क्षमा मांगने की तैयारी शुरू कर दी। अब आगे देखना यह है कि इंद्र का हृदय परिवर्तन होता है या नहीं, और शीतला माता अपने भक्तों की रक्षा कैसे करती हैं।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि इंद्र के अभिमान के कारण पृथ्वी पर सूखा और बीमारियाँ फैल गईं, जिससे लोगों का जीवन संकट में आ गया। शीतला माता ने भक्तों की पीड़ा देखी और उन्हें बचाने के लिए प्रकट हुईं। इस अध्याय से यह सीख मिलती है कि अहंकार विनाशकारी होता है और भगवत भक्ति ही सच्चा मार्ग है।
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