त्रिपुर सुंदरी कथा – अध्याय 6: भण्डासुर का पराजय | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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त्रिपुर सुंदरी कथा – अध्याय 6: भण्डासुर का पराजय

Tilak Kathayein13 Apr 202649 views📖 1 min read
त्रिपुर सुंदरी कथा
त्रिपुर सुंदरी कथा का अध्याय 6 — भण्डासुर का पराजय। इस अध्याय में त्रिपुर सुंदरी द्वारा भण्डासुर का वध किया जाता है और देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्ति मिलती है।

भण्डासुर का पराजय

पिछले अध्याय में हमने देखा कि देवी त्रिपुर सुंदरी और भण्डासुर के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो चुका था। असुरों की विशाल सेना देवी के पराक्रम के सामने टिक नहीं पा रही थी, फिर भी भण्डासुर अपनी मायावी शक्तियों से देवताओं और देवी के गणों को परेशान कर रहा था। यह अंतिम अध्याय उस महान युद्ध के अंत और धर्म की विजय का वर्णन करता है।

अंतिम युद्ध की शुरुआत

रणभूमि में धूल का गुबार छाया हुआ था। देवी त्रिपुर सुंदरी अपने दिव्य रथ पर विराजमान थीं, उनका तेज सूर्य के समान प्रखर था। उनके नेत्रों में करुणा और क्रोध का अद्भुत मिश्रण था। राक्षसों की चीख-पुकार से दिशाएं गूंज रही थीं। देवी के अस्त्र-शस्त्रों ने असुरों की सेना में हाहाकार मचा दिया था। हर ओर रक्त की नदी बह रही थी, मानो प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया हो। देवी के प्रत्येक प्रहार से असुर धराशायी हो रहे थे, फिर भी भण्डासुर अपनी माया से युद्ध को और भी भीषण बना रहा था।

भण्डासुर ने क्रोधित होकर कहा, "देवी, तुम अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रही हो, परन्तु यह शक्ति क्षणिक है। मैं तुम्हें और तुम्हारे देवताओं को नष्ट कर दूंगा!" देवी त्रिपुर सुंदरी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "असुर, तू अहंकार में अंधा हो गया है। धर्म की रक्षा के लिए, सत्य की स्थापना के लिए, तेरा अंत निश्चित है!"

भण्डासुर का वध

देवी त्रिपुर सुंदरी ने अपना दिव्य चक्र उठाया, जो अग्नि के समान जल रहा था। उन्होंने चक्र को भण्डासुर की ओर निर्देशित किया। चक्र तीव्र गति से भण्डासुर की ओर बढ़ा, मार्ग में आने वाली हर बाधा को भस्म करता हुआ। भण्डासुर ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करके चक्र को रोकने का प्रयास किया, परन्तु देवी का चक्र उसकी माया को भेदता हुआ सीधा भण्डासुर के हृदय में जा लगा। एक भयानक गर्जना के साथ भण्डासुर धराशायी हो गया। उसकी मृत्यु के साथ ही असुरों की सेना में भगदड़ मच गई।

देवी त्रिपुर सुंदरी के मुख पर विजय की आभा थी। उनका दिव्य रूप और भी तेजस्वी हो गया। उन्होंने अपने भक्तों को आशीष दिया और देवताओं को अभयदान दिया। समस्त ब्रह्मांड में शांति छा गई। देवी की कृपा से धरती हरी-भरी हो गई और नदियों में अमृत बहने लगा। देवताओं ने एक स्वर में देवी की स्तुति की, "जय माँ त्रिपुर सुंदरी! जय हो! जय हो!"

देवताओं की मुक्ति और खुशी

भण्डासुर के वध के बाद सभी देवता उसके अत्याचार से मुक्त हो गए थे। इन्द्र, वरुण, कुबेर आदि सभी देवता देवी त्रिपुर सुंदरी के चरणों में नतमस्तक हो गए। उन्होंने देवी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने उन्हें असुरों के आतंक से बचाया। स्वर्ग में फिर से आनंद और उत्सव का माहौल बन गया। अप्सराएं नृत्य करने लगीं और गन्धर्व संगीत गाने लगे। हर ओर खुशहाली और समृद्धि का वास हो गया। देवी त्रिपुर सुंदरी का यह कृत्य सदैव याद रखा जाएगा और उनकी महिमा का गान युगों-युगों तक होता रहेगा। अब, देवी भक्तों को शाश्वत अनुग्रह प्रदान करने के लिए तैयार हैं, जिसकी चर्चा अगले अध्याय में की जाएगी।

अध्याय 6 का सार: इस अध्याय में देवी त्रिपुर सुंदरी ने भण्डासुर का वध करके देवताओं को मुक्त कराया और धर्म की स्थापना की। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सत्य और धर्म की हमेशा विजय होती है, चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों। अहंकार और बुराई का अंत निश्चित है।

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