Parama Ekadashi Vrat Katha | भगवान विष्णु की कृपा पाने का व्रत - Tilak Kathayein
एकादशी व्रत कथा

परमा एकादशी व्रत | Parama Ekadashi Vrat Katha in Hindi

Tilak Kathayein11 Jun 202668 views📖 1 min read
परमा एकादशी व्रत | Parama Ekadashi Vrat Katha in Hindi
परमा एकादशी व्रत कथा हिंदी में पढ़ें। जानें परमा एकादशी का महत्व, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त, कथा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के धार्मिक लाभ।

परमा एकादशी का महत्त्व:

अर्जुन ने कहा, हे कमलनयन! आपने शुक्ल पक्ष की एकादशी का विस्तारपूर्वक वर्णन कर मुझे सुनाया, अतः अब आप कृपा करके मुझे अधिकमास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसमें किस देवता का पूजन किया जाता है तथा इसके व्रत से किस फल की प्राप्ति होती है? तथा उसकी विधि क्या है? इन सब के बारे मे बताइए।

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! अधिकमास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है वह परमा एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं।

अधिकमास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशियां होती हैं। अधिकमास में 2 एकादशियां होती हैं, जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती हैं।

इसके व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को इसलोक में सुख तथा परलोक में सद्गति प्राप्त होती है। इसका व्रत विधानानुसार करना चाहिए और भगवान विष्णु का धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए।

इस एकादशी की पावन कथा जो कि महर्षियों के साथ काम्पिल्य नगरी में हुई थी, वह मैं तुमसे कहता हूं। ध्यानपूर्वक श्रवण करो..

परमा एकादशी व्रत कथा!

काम्पिल्य नगरी में सुमेधा नाम का एक अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री अत्यंत पवित्र तथा पतिव्रता थी। किसी पूर्व पाप के कारण वह दंपती अत्यंत दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

ब्राह्मण को भिक्षा मांगने पर भी भिक्षा नहीं मिलती थी। उस ब्राह्मण की पत्नी वस्त्रों से रहित होते हुए भी अपने पति की सेवा करती थी तथा अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी और पति से कभी किसी वस्तु की मांग नहीं करती थी। दोनों पति-पत्नी घोर निर्धनता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

एक दिन ब्राह्मण अपनी स्त्री से बोला: हे प्रिय! जब मैं धनवानों से धन की याचना करता हूँ तो वह मुझे मना कर देते हैं। गृहस्थी धन के बिना नहीं चलती, इसलिए यदि तुम्हारी सहमति हो तो मैं परदेस जाकर कुछ काम करूं, क्योंकि विद्वानों ने कर्म की प्रशंसा की है।

ब्राह्मण की पत्नी ने विनीत भाव से कहा: हे स्वामी! मैं आपकी दासी हूँ। पति अच्छा और बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नी को वही करना चाहिए। मनुष्य को पूर्व जन्म में किए कर्मों का फल मिलता है। सुमेरु पर्वत पर रहते हुए भी मनुष्य को बिना भाग्य के स्वर्ण नहीं मिलता। पूर्व जन्म में जो मनुष्य विद्या और भूमि दान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में विद्या और भूमि की प्राप्ति होती है। ईश्वर ने भाग्य में जो कुछ लिखा है, उसे टाला नहीं जा सकता।

यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते हैं, इसलिए आपको इसी स्थान पर रहना चाहिए, क्योंकि मैं आपका विछोह नहीं सह सकती। पति बिना स्त्री की माता, पिता, भाई, श्वसुर तथा सम्बंधी आदि सभी निंदा करते हैं, हसलिए हे स्वामी! कृपा कर आप कहीं न जाएं, जो भाग्य में होगा, वह यहीं प्राप्त हो जाएगा।

स्त्री की सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। इसी प्रकार समय बीतता रहा। एक बार कौण्डिन्य ऋषि वहां आए..

ऋषि को देखकर ब्राह्मण सुमेधा और उसकी स्त्री ने उन्हें प्रणाम किया और बोले: आज हम धन्य हुए। आपके दर्शन से आज हमारा जीवन सफल हुआ।

ऋषि को उन्होंने आसन तथा भोजन दिया। भोजन देने के बाद पतिव्रता ब्राह्मणी ने कहा: हे ऋषिवर! कृपा कर आप मुझे दरिद्रता का नाश करने की विधि बतलाइए। मैंने अपने पति को परदेश में जाकर धन कमाने से रोका है। मेरे भाग्य से आप आ गए हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट हो जाएगी, अतः आप हमारी दरिद्रता नष्ट करने के लिए कोई उपाय बताएं।

ब्राह्मणी की बात सुन कौण्डिन्य ऋषि बोले: हे ब्राह्मणी! मल मास की कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी के व्रत से सभी पाप, दुःख और दरिद्रता आदि नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह धनवान हो जाता है। इस व्रत में नृत्य, गायन आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिए..

..यह एकादशी धन-वैभव देती है तथा पापों का नाश कर उत्तम गति भी प्रदान करने वाली होती है। धनाधिपति कुबेर ने भी इस एकादशी व्रत का पालन किया था जिससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें धनाध्यक्ष का पद प्रदान किया। इसी व्रत के प्रभाव से सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को पुत्र, स्त्री और राज्य की प्राप्ति हुई थी।

तदुपरांत कौण्डिन्य ऋषि ने उन्हें एकादशी के व्रत का समस्त विधान कह सुनाया। ऋषि ने कहा: हे ब्राह्मणी! पंचरात्रि व्रत इससे भी ज्यादा उत्तम है। परमा एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधानपूर्वक पंचरात्रि व्रत आरम्भ करना चाहिए।..

जो मनुष्य पांच दिन तक निर्जल व्रत करते हैं, वे अपने मा-पिता और स्त्री सहित स्वर्ग लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक संध्या को भोजन करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। जो मनुष्य स्नान करके पांच दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, वे समस्त संसार को भोजन कराने का फल पाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत में अश्व दान करते हैं, उन्हें तीनों लोकों को दान करने का फल मिलता है। जो मनुष्य उत्तम ब्राह्मण को तिल दान करते हैं, वे तिल की संख्या के बराबर वर्षो तक विष्णुलोक में वास करते हैं। जो मनुष्य घी का पात्र दान करते हैं, वह सूर्य लोक को जाते हैं। जो मनुष्य पांच दिन तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहते हैं, वे देवांगनाओं के साथ स्वर्ग को जाते हैं। हे ब्राह्मणी! तुम अपने पति के साथ इसी व्रत को धारण करो। इससे तुम्हें अवश्य ही सिद्धि और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

कौण्डिन्य ऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण और उसकी स्त्री ने परमा एकादशी का पांच दिन तक व्रत किया। व्रत पूर्ण होने पर ब्राह्मण की स्त्री ने एक राजकुमार को अपने यहाँ आते देखा।

राजकुमार ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से एक उत्तम घर जो कि सब वस्तुओं से परिपूर्ण था, उन्हें रहने के लिए दिया। तदुपरांत राजकुमार ने आजीविका के लिए एक गांव दिया। इस प्रकार ब्राह्मण और उसकी स्त्रीकी गरीबी दूर हो गई और पृथ्वी पर काफी वर्षों तक सुख भोगने के पश्चात वे पति-पत्नी श्रीविष्णु के उत्तम लोक को प्रस्थान कर गए।

व्रत विधि

दशमी की रात से ही व्रत की शुरुआत हो जाती है। इस रात हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करें और जमीन पर शयन करना श्रेष्ठ माना जाता है।

एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। भगवान को स्नान कराएं, नवीन वस्त्र अर्पित करें और तुलसी दल चढ़ाना अत्यंत शुभ होता है। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते रहें।

समयकरने का कार्य
सूर्योदय से पूर्वनित्यकर्म से निवृत होकर स्नान करें।
प्रातःकालभगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
मध्य दिवसभगवान विष्णु की षोडशोपचार (16 प्रकार से) पूजा करें।
सायंकालभगवान विष्णु के समक्ष दीपक प्रज्वलित कर भजन-कीर्तन करें।
रात्रिफलाहार ग्रहण कर भगवान का स्मरण करते हुए शयन करें।

द्वादशी के दिन, सूर्योदय के पश्चात, ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देकर, पश्चात स्वयं पारण करें। पारण के समय भगवान विष्णु की पूजा अवश्य करें।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

परमा एकादशी व्रत में फलाहार, कूटू का आटा, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, दूध और दूध से बने पदार्थ, मेवे (जैसे बादाम, काजू, किशमिश) आदि का सेवन किया जा सकता है। विशेष रूप से आंवले का सेवन और दान करना इस दिन अत्यधिक शुभ माना जाता है।

इस व्रत में चावल का सेवन पूर्णतया वर्जित है। साथ ही, किसी भी प्रकार की दाल, बैंगन, लौकी, और प्याज-लहसुन का सेवन भी नहीं करना चाहिए। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि मान्यतानुसार, चावल में भगवान विष्णु का अंश माना जाता है और एकादशी के दिन इसके सेवन से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है।

परमा एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के समस्त पूर्व जन्म के और इस जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। पद्म पुराण के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को असह्य पापों से मुक्ति मिलती है।
  • मोक्ष प्राप्ति – आमलकी एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, जिससे व्यक्ति को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
  • सांसारिक लाभ – यह व्रत धन, यश, सुख-समृद्धि और दीर्घायु प्रदान करता है। घर में सुख-शांति बनी रहती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया को आराम मिलता है, जिससे शरीर डिटॉक्स होता है और स्वास्थ्य में सुधार होता है। यह आध्यात्मिक और शारीरिक शुद्धि का एक उत्तम माध्यम है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में परमा एकादशी व्रत कब है?

2026 में परमा एकादशी 11 जून , गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त 11 जून की सुबह 4:18 बजे तक रहेगा।

परमा एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

शास्त्रों के अनुसार, चावल को अन्नपूर्णा का रूप माना जाता है और कुछ कथाओं के अनुसार, यह भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, इसलिए इस दिन चावल का सेवन करना उनके प्रति अनादर माना जाता है और व्रत के पुण्य को क्षीण करता है।

क्या बीमार व्यक्ति परमा एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, वृद्ध या गर्भवती महिलाएं यदि पूर्ण उपवास न रख सकें तो वे फलाहार कर सकती हैं या दिन में एक बार सात्विक भोजन ग्रहण कर सकती हैं। वे चाहें तो किसी अन्य को व्रत का पुण्य दान भी कर सकती हैं।

निष्कर्ष

परमा एकादशी व्रत का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है। यह उन सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है जो भगवान विष्णु को समर्पित हैं। इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को भगवान विष्णु स्वयं अक्षय पुण्य का वरदान देते हैं। इस एकादशी को विधि-विधान से करने पर मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे बैकुंठ की प्राप्ति होती है। आंवले के वृक्ष की पूजा और दान इस दिन को और भी कल्याणकारी बना देता है।

सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ परमा एकादशी व्रत रखना चाहिए। भगवान विष्णु अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उन्हें संसार के दुखों से मुक्ति दिलाते हैं। जय श्री हरि!

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