Nirjala Ekadashi | निर्जला एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026 | TilakKathayein
एकादशी व्रत कथा

Nirjala Ekadashi | निर्जला एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

Tilak Kathayein20 May 2026180 views📖 1 min read
निर्जला एकादशी – Nirjala Ekadashi
निर्जला एकादशी 2026 – व्रत कथा, विधि, क्या खाएं, शुभ मुहूर्त और लाभ। भगवान विष्णु की कृपा पाएं।

निर्जला एकादशी – परिचय

निर्जला एकादशी ज्येष्ठमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। वर्ष 2026 में, यह एकादशी 26 मई को मनाई जाएगी। इस एकादशी को निर्जला इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस व्रत में जल का त्याग किया जाता है, अर्थात् बिना जल ग्रहण किए ही यह व्रत पूर्ण किया जाता है। यह व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है।

निर्जला एकादशी का सभी एकादशियों में विशेष स्थान है क्योंकि इसे सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस एक एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है। यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसे करने से सभी कष्ट दूर होते हैं।

निर्जला एकादशी की व्रत कथा

युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।

भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं।

तब वेदव्यासजी कहने लगे: दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे। द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे। राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए।

यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि: भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो... किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा: यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना।

भीमसेन बोले: महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ। एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा।

व्यासजी ने कहा: भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं। अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है। मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।

कुन्तीनन्दन ! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है। पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि: मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा। द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे:

देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

संसार सागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक मे पाण्डव द्वादशी के नाम से विख्यात हुई।

व्रत विधि

दशमी की रात से ही व्रत की तैयारी शुरू हो जाती है। दशमी की रात को सात्विक भोजन करें और हल्का भोजन करें। रात को जल्दी सो जाएं ताकि सुबह जल्दी उठ सकें।

एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु की पूजा करें। विष्णु अर्चना में तुलसी दल अवश्य अर्पित करें और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।

समयकरने का कार्य
प्रातःकालस्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं।
पूजाविष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और भगवान विष्णु की आरती करें। तुलसी दल और पीले फूल अर्पित करें।
दिन भरनिर्जल रहें और भगवान विष्णु का ध्यान करें। गरीबों और जरूरतमंदों को दान करें।
संध्याकालशाम को भगवान विष्णु की आरती करें और भजन-कीर्तन करें।
रात्रिरात को जागरण करें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।

द्वादशी को पारण सूर्योदय के बाद करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। तुलसी दल और चरणामृत ग्रहण करके व्रत तोड़ें। सात्विक भोजन से व्रत का पारण करें।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

निर्जला एकादशी व्रत में फल, कुट्टू के आटे से बनी चीजें, साबूदाना, दूध और मेवे खा सकते हैं। फलों में केला, सेब, अनार और नारियल पानी का सेवन किया जा सकता है। कुट्टू के आटे से पकौड़े या रोटी बनाकर खा सकते हैं। साबूदाने की खीर या टिक्की भी खाई जा सकती है।

निर्जला एकादशी व्रत में चावल, दाल, लहसुन-प्याज और मांसाहारी भोजन वर्जित हैं। चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और एकादशी व्रत में इसका सेवन निषेध है। लहसुन और प्याज तामसिक भोजन माने जाते हैं, इसलिए इनका त्याग किया जाता है।

निर्जला एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – निर्जला एकादशी व्रत करने से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है। पुराणों में कहा गया है, "निर्जला एकादशी व्रतं कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।" अर्थात्, निर्जला एकादशी का व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
  • मोक्ष प्राप्ति – यह व्रत मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है और आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है।
  • सांसारिक लाभ – इस व्रत को करने से सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है। पारिवारिक जीवन में खुशहाली आती है और आर्थिक संकट दूर होते हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास करने से शरीर की शुद्धि होती है और पाचन तंत्र को आराम मिलता है। यह शरीर को डिटॉक्स करने और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में निर्जला एकादशी कब है?

वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी 26 मई, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन एकादशी तिथि 26 मई को दोपहर 02:35 बजे शुरू होगी और 26 मई को दोपहर 01:12 बजे समाप्त होगी।

निर्जला एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, चावल को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि चंद्रमा मन को विचलित करता है। एकादशी व्रत में मन को शांत और स्थिर रखना आवश्यक होता है ताकि भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहा जा सके। इसलिए, चावल का सेवन वर्जित होता है ताकि मन की एकाग्रता बनी रहे और व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

क्या बीमार व्यक्ति निर्जला एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, गर्भवती महिलाओं और वृद्धों को निर्जला एकादशी व्रत रखने से बचना चाहिए। हालांकि, वे चाहें तो फलाहारी व्रत रख सकते हैं या केवल जल ग्रहण करके व्रत का पालन कर सकते हैं। उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ही व्रत करना चाहिए।

निष्कर्ष

निर्जला एकादशी का अद्वितीय आध्यात्मिक महत्व है। भगवान विष्णु इस व्रत को सच्ची श्रद्धा से करने वालों को यह आश्वासन देते हैं कि उनके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। यह एकादशी सभी एकादशियों में सबसे शक्तिशाली मानी जाती है क्योंकि यह बिना जल के उपवास करने की कठिन तपस्या का प्रतीक है, जो मन और शरीर को शुद्ध करती है।

सभी भक्तों को निर्जला एकादशी का व्रत पूर्ण विश्वास के साथ करना चाहिए। यह व्रत आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाएगा। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

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