Devutthana Ekadashi | देवउठनी एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026 | TilakKathayein
एकादशी व्रत कथा

Devutthana Ekadashi | देवउठनी एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

Tilak Kathayein21 May 202669 views📖 1 min read
देवउठनी एकादशी – Devutthana Ekadashi
देवउठनी एकादशी 2026 – व्रत कथा, विधि, क्या खाएं, शुभ मुहूर्त और लाभ। भगवान विष्णु की कृपा पाएं।

देवउठनी एकादशी – परिचय

देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह एकादशी भगवान विष्णु के शयनकाल की समाप्ति और उनके पुनर्जागरण का प्रतीक है। 2026 में, यह एकादशी 15 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस एकादशी को 'देवउठनी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की निद्रा से जागते हैं।

सभी एकादशियों में देवउठनी एकादशी का विशेष स्थान है। इसे 'सर्वसिद्धि एकादशी' भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन व्रत रखने से सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है और सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। यह एकादशी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर मानी जाती है।

देवउठनी एकादशी की व्रत कथा

एक प्राचीन कथा के अनुसार, एक राजा था जिसने अपनी प्रजा का पालन पोषण अत्यंत कुशलता से किया। परंतु, एक दिन उसके राज्य पर अकाल आ गया। प्रजा भूख से व्याकुल थी और राजा को बहुत दुःख हुआ। उसने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श किया और अंततः राज्य को बचाने के लिए एक कठोर निर्णय लिया।

राजा ने प्रजा से कहा कि वे अपनी क्षमता अनुसार दान करें, जिससे भूख से पीड़ित लोगों की सहायता की जा सके। राजा स्वयं भी इस व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो गया। उसने विधि-विधान से एकादशी का व्रत रखा और भगवान से प्रार्थना की कि वे इस संकट को दूर करें।

भगवान विष्णु राजा की भक्ति और प्रजा के प्रति उसके प्रेम से प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा को दर्शन दिए और वरदान दिया कि अकाल समाप्त हो जाएगा और राज्य में सुख-समृद्धि लौटेगी। इस व्रत के प्रभाव से राजा और प्रजा सभी कष्टों से मुक्त हो गए।

व्रत विधि

देवउठनी एकादशी का व्रत दशमी तिथि की रात्रि से ही प्रारंभ हो जाता है। इस रात सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराकर, उन्हें नवीन वस्त्र अर्पित करें। पीले पुष्प, तुलसी दल और फल-फूल से भगवान की पूजा करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते रहें।

समयकरने का कार्य
प्रातःकालब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, व्रत का संकल्प लें।
सूर्य उदय के पश्चातभगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराएं, वस्त्र अर्पित करें।
पूजा कालविष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, तुलसी दल अर्पित करें, मंत्र जाप करें।
सायंकालदीपदान करें, भगवान विष्णु की आरती उतारें।
रात्रिफलाहार ग्रहण करें या निर्जल व्रत रखें।

द्वादशी तिथि के सूर्योदय से पूर्व व्रत का पारण किया जाता है। पारण के समय भगवान विष्णु की पूजा करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इसके पश्चात ही सात्विक भोजन ग्रहण करें। एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी को ही करना चाहिए, त्रयोदशी को नहीं।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

देवउठनी एकादशी के व्रत में सात्विक और फलाहारी भोजन का विधान है। आप फल, दूध, दही, पनीर, मक्खन, मेवे (बादाम, काजू, किशमिश), कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और साबूदाना का सेवन कर सकते हैं। इन सामग्रियों से बनी हुई शुद्ध और सात्विक सामग्री का उपभोग करें।

इस व्रत में चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है। इसके अतिरिक्त, मसूर, चना, जौ, गेहूं, बैंगन, प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन और किसी भी प्रकार की मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए। चावल वर्जित होने का कारण यह है कि कहा जाता है कि चावल की उत्पत्ति महर्षि मेधा के अंश से हुई है, जो एकादशी के दिन वर्जित माने जाते हैं।

देवउठनी एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी जाने-अनजाने में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। पुराणों के अनुसार, यह व्रत व्यक्ति को नरक की यातनाओं से मुक्ति दिलाता है।
  • मोक्ष प्राप्ति – भगवान विष्णु की कृपा से इस व्रत को रखने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
  • सांसारिक लाभ – यह व्रत रखने से धन, धान्य, सुख, समृद्धि और संतान की प्राप्ति होती है। सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है और शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में देवउठनी एकादशी कब है?

2026 में देवउठनी एकादशी 15 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त 15 नवंबर की सुबह 05:01 बजे से शुरू होकर 16 नवंबर की सुबह 06:40 बजे तक रहेगा।

देवउठनी एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, चावल को महर्षि मेधा के अंश से उत्पन्न माना जाता है। एकादशी के दिन महर्षि मेधा का अंश खाना वर्जित है, इसलिए इस दिन चावल का सेवन नहीं किया जाता है। कुछ कथाओं में इसे भगवान विष्णु से भी जोड़कर देखा जाता है, जिनके शयनकाल के दौरान चावल का सेवन उन्हें अप्रिय माना गया है।

क्या बीमार व्यक्ति देवउठनी एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, गर्भवती महिलाएं या वृद्ध व्यक्ति यदि पूर्ण व्रत न रख सकें, तो वे फलाहार व्रत रख सकते हैं या केवल एक समय का भोजन कर सकते हैं। ऐसे में वे भगवान विष्णु का स्मरण और भजन करें।

निष्कर्ष

देवउठनी एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह वह पावन अवसर है जब भगवान विष्णु अपनी चार माह की निद्रा से जागते हैं और सृष्टि के कल्याण के लिए पुनः सक्रिय होते हैं। इस एकादशी का व्रत रखने वाले भक्तों पर भगवान विष्णु विशेष कृपा बरसाते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि इसे सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

सभी भक्तों को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ देवउठनी एकादशी का व्रत रखना चाहिए। भगवान विष्णु अपने भक्तों की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण करते हैं। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

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