करणी माता कथा – अध्याय 2: विवाह और त्याग

विवाह और त्याग
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार माँ करणी का जन्म एक दैवीय संकेत के साथ हुआ था और कैसे उन्होंने बचपन से ही अपनी अलौकिक शक्तियों से सबको चकित कर दिया था। अब, हम उनके जीवन के अगले अध्याय में प्रवेश करते हैं, जहाँ उन्हें सामाजिक बंधनों में बंधना है, लेकिन उनका मन सांसारिक सुखों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए व्याकुल है।
देपोजी चारण से विवाह
समय बीतने के साथ माँ करणी युवावस्था में प्रवेश कर गईं। उनका तेज और सौंदर्य अद्भुत था। उनके शांत स्वभाव और बुद्धिमत्ता ने सभी को आकर्षित किया। गाँव के लोग उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। चारणों की कुलदेवी होने के कारण, उनके विवाह की चर्चाएं चारों ओर होने लगीं। आखिरकार, देपोजी चारण नामक एक योग्य युवक से उनका विवाह तय कर दिया गया। विवाह की तैयारी धूमधाम से शुरू हुई। पूरे गाँव में उत्सव का माहौल था। हर कोई माँ करणी को दुल्हन के रूप में देखने के लिए उत्सुक था।
"माँ सा, आप इतनी उदास क्यों हैं?" एक सखी ने पूछा। "क्या आपको यह विवाह पसंद नहीं है?" करणी माता ने धीरे से उत्तर दिया, "मैं जानती हूँ कि यह मेरे परिवार की इच्छा है और मैं उनका सम्मान करती हूँ, लेकिन मेरा मन सांसारिक बंधनों में बंधने के लिए नहीं है। मेरा लक्ष्य इस धरती पर कुछ और ही है, कुछ ऐसा जो इस विवाह से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।" उन्होंने अपने मन में ठान लिया था की उन्हें किस दिशा में आगे बढ़ना है।
वैवाहिक जीवन में उदासीनता
विवाह संपन्न हुआ। करणी माता देपोजी के घर आईं। उन्होंने एक आदर्श पत्नी की भूमिका निभाई, घर के सभी काम करतीं, सबका सम्मान करतीं, और देपोजी की सेवा करतीं। लेकिन उनका मन वैवाहिक जीवन में नहीं रमा। वे हमेशा ध्यान में लीन रहतीं, ईश्वर का चिंतन करतीं और गरीबों की सेवा करतीं। देपोजी ने उनकी उदासीनता को महसूस किया और चिंतित होने लगे। उन्हें लगता था कि करणी उनसे दूर होती जा रही हैं।
एक रात, देपोजी ने करणी से कहा, "करणी, मुझे ऐसा लगता है कि तुम मुझसे खुश नहीं हो। क्या मैं तुम्हें वह सुख नहीं दे पा रहा हूँ जिसकी तुम हकदार हो?" करणी ने शांत भाव से उत्तर दिया, "यह बात नहीं है, स्वामी। आप एक अच्छे पति हैं और मैं आपका सम्मान करती हूँ। लेकिन मेरा हृदय किसी और ही प्रेम में डूबा हुआ है। मेरा प्रेम इस संसार से परे, उस परम शक्ति के प्रति है जिसने हमें बनाया है।" देपोजी उनकी बात सुनकर हैरान रह गए। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। करणी माता ने अपनी दैवीय प्रकृति से देपोजी को अवगत कराया और उन्हें अपने मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही यह भी कहा की वे अपने पति को कभी नहीं त्यागेंगी बल्कि एक पत्नी के सभी कर्तव्य निभाएंगी।
गुलाबोजी से विवाह करवाना
करणी माता ने देपोजी को समझाया कि उनका सांसारिक जीवन के प्रति कोई मोह नहीं है और वे अपना जीवन दूसरों की सेवा में समर्पित करना चाहती हैं। उन्होंने देपोजी को अपनी छोटी बहन गुलाबोजी से विवाह करने का सुझाव दिया। पहले तो देपोजी हिचकिचाए, लेकिन करणी माता ने उन्हें समझाया कि यह गुलाबोजी के जीवन को भी सुखमय बना देगा और उनके वंश को भी आगे बढ़ाएगा। करणी माता ने स्वयं गुलाबोजी को देपोजी के साथ विवाह के लिए तैयार किया। विवाह संपन्न हुआ और गुलाबोजी देपोजी की पत्नी बनीं। करणी माता ने एक बड़ी बहन की तरह गुलाबोजी का मार्गदर्शन किया और उन्हें एक अच्छी पत्नी और माता बनने में मदद की। इस घटना से करणी माता के त्याग और परोपकार की भावना का पता चलता है।
अध्याय 2 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे माँ करणी का विवाह देपोजी चारण से हुआ, लेकिन उनका मन सांसारिक सुखों में नहीं लगा। उन्होंने अपने पति को अपनी बहन गुलाबोजी से विवाह करने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनके त्याग और दूसरों के कल्याण के प्रति समर्पण की भावना का पता चलता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा में और ईश्वर के प्रति समर्पण में है। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे माँ करणी ने अपनी दैवीय शक्तियों का उपयोग कर लोगों को चमत्कार और आशीर्वाद दिए।
आज का पंचांग 11 सितम्बर 2026
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