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द्रौपदी वस्त्रहरण कथा – अध्याय 5: भीम की प्रतिज्ञा और क्रोध का अनावरण

Tilak Kathayein12 Apr 2026149 views
द्रौपदी वस्त्रहरण कथा
द्रौपदी वस्त्रहरण कथा का अध्याय 5 — भीम की प्रतिज्ञा और क्रोध का अनावरण। भीम क्रोधित होकर प्रतिज्ञा करते हैं कि वे दुशासन की छाती चीर कर उसका रक्त पिएंगे और द्रौपदी के अपमान का बदला लेंगे।

भीम की प्रतिज्ञा और क्रोध का अनावरण

श्री कृष्ण के चमत्कारी वस्त्रों ने द्रौपदी की लाज बचाई, परन्तु अपमान की ज्वाला पांडवों के ह्रदय में धधकती रही। युधिष्ठिर का जुए में हारना और दुर्योधन का नीच कृत्य, भीम के लिए असहनीय था। द्रौपदी की चीत्कार और दुशासन का घृणित व्यवहार, भीम के धैर्य की अंतिम सीमा थी।

क्रोध का ज्वालामुखी

जैसे ही द्रौपदी अदृश्य वस्त्रों से ढँक गई, एक गहरा सन्नाटा सभा में छा गया। परन्तु यह शांति तूफ़ान से पहले की शांति थी। भीमसेन, जिनकी भुजाओं में दस हज़ार हाथियों का बल था, क्रोध से थर-थर काँपने लगे। उनकी आँखें अंगारे के समान लाल हो गईं, और उनके विशाल शरीर पर क्रोध का पसीना बहने लगा। उन्हें द्रौपदी का अपमान अपनी माता कुंती के अपमान के समान लग रहा था। उनके भीतर का योद्धा, उनकी सहनशीलता की सीमा लांघ चुका था।

भीम ने गहरी सांस ली, उनकी छाती फूल गई, मानो वह कोई शक्तिशाली विस्फोट झेलने जा रही हो। "यह क्या हो रहा है?" उन्होंने सोचा। "धर्मराज ने हमें जुए में हार कर स्वयं को और द्रौपदी को दास बना दिया? क्या हम अब अपनी बहनों और माता का अपमान भी सहन करेंगे?" भीतर ही भीतर उनका क्रोध प्रचंड वेग से बढ़ रहा था।

दुशासन के वध की धमकी

गرجते हुए स्वर में भीम ने प्रतिज्ञा की, "जिस दुशासन ने भरी सभा में द्रौपदी के केश खींचे हैं, मैं अपनी गदा से उसकी छाती चीर कर उसका रक्त पी जाऊँगा! यदि मैंने ऐसा नहीं किया तो मुझे मेरे पितरों की गति न मिले!" भीम की प्रतिज्ञा से पूरी सभा भय से काँप उठी। दुर्योधन और उसके साथी सहम गए। धृतराष्ट्र भी चिंतित हो उठे, क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि भीम अपनी प्रतिज्ञा को अवश्य पूरा करेंगे।

श्री कृष्ण ने अप्रत्यक्ष रूप से भीम के क्रोध को शांत किया। उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों के मन में धर्म की स्मृति जगाई। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भीम का क्रोध नियंत्रण से बाहर न हो, ताकि इससे और भी अधिक विनाश न हो। कृष्ण जानते थे कि भीम का क्रोध धर्म की स्थापना के लिए आवश्यक है, परन्तु उसे सही दिशा में ले जाना भी जरुरी है।

भीम की भयंकर प्रतिज्ञा

भीम ने अपनी गदा उठाई, मानो वह दुशासन को अभी मार डालेंगे। "यह मेरी प्रतिज्ञा है!" उन्होंने दहाड़ते हुए कहा। "मैं, भीमसेन, यह शपथ लेता हूँ कि युद्ध में दुर्योधन की जंघा भी तोडूंगा! मेरे बाणों से कौरवों की सेना का संहार होगा! द्रौपदी के अपमान का बदला मैं अवश्य लूंगा!" भीम की प्रतिज्ञा से दसों दिशाएँ गूंज उठीं। सभा में सन्नाटा छा गया। युधिष्ठिर का सिर लज्जा से झुक गया। अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया। नकुल और सहदेव ने अपने भाई की ओर देखा, उनके मन में चिंता और प्रतिज्ञा का भाव एक साथ था। भीम की यह प्रतिज्ञा आगे चलकर महाभारत के युद्ध का प्रमुख कारण बनी, और पांडवों के विजय का मार्ग प्रशस्त किया। अब देखना यह है कि धृतराष्ट्र इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

अध्याय 5 का सार: द्रौपदी के अपमान के बाद, भीम का क्रोध फूट पड़ता है। वह दुशासन का वध करने और दुर्योधन की जंघा तोड़ने की भयंकर प्रतिज्ञा लेता है। यह अध्याय दर्शाता है कि अन्याय के विरुद्ध क्रोध कितना आवश्यक है, परन्तु उस क्रोध को धर्म के मार्ग पर रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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आज का पंचांग 11 सितम्बर 2026

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