ध्रुव भक्त कथा – अध्याय 4: विष्णु का दिव्य दर्शन

विष्णु का दिव्य दर्शन
ध्रुव की कठोर तपस्या, जिसने तीनों लोकों को हिला दिया था, अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। उसकी भक्ति, अडिग विश्वास और दृढ़ संकल्प देखकर देवता भी चकित थे। अब, उस छोटे बालक को, जिसने राजपाठ छोड़कर भगवान विष्णु को पाने की ठान ली थी, अपने आराध्य के साक्षात दर्शन होने का समय आ गया था।
अटल ध्यान
बालक ध्रुव आँखें बंद किए, एक पैर पर खड़े होकर, अपनी सांसों को रोककर, केवल भगवान विष्णु के नाम का जाप कर रहा था। उसके मन में न कोई संदेह था, न कोई भय। चारों तरफ जंगल में जंगली जानवर घूम रहे थे, तेज हवाएं चल रही थीं, लेकिन ध्रुव की तपस्या में कोई बाधा नहीं आ रही थी। उसकी आँखों के भीतर भगवान विष्णु की छवि स्पष्ट होती जा रही थी। उसे लग रहा था कि वह अब उस दिव्य प्रकाश के सम्मुख खड़ा है, जिसके लिए उसने इतना कष्ट सहा है। उसका शरीर रोम-रोम पुलकित हो रहा था।
उसके मन में विचार आया, "क्या मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि मुझे भगवान विष्णु के दर्शन होंगे? क्या मेरी तपस्या इतनी सफल हो गई है कि वे स्वयं मुझे दर्शन देने आए हैं? हे भगवान, कृपा करो और मुझे अपनी भक्ति में लीन रखो।"
विष्णु का प्रकटीकरण
अचानक, एक अद्भुत प्रकाश फैला। वह प्रकाश इतना तीव्र था कि ध्रुव को अपनी आँखें खोलनी पड़ीं। उसके सामने, गरुड़ पर सवार, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए, भगवान विष्णु प्रकट हुए। उनका दिव्य रूप इतना तेजस्वी था कि ध्रुव की आँखें चकाचौंध हो गईं। भगवान विष्णु की आभा से पूरा वन प्रकाशित हो गया, जैसे सूर्य की सहस्त्र किरणें एक साथ धरती पर उतर आई हों।
भगवान विष्णु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए ध्रुव की ओर देखा। उनकी दृष्टि में प्रेम और करुणा का सागर लहरा रहा था। ध्रुव का कंठ अवरुद्ध हो गया। वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा, अश्रुधारा बहने लगी। विष्णु भगवान ने अपने कोमल हाथों से उसे उठाया। उस स्पर्श से ध्रुव को ऐसा लगा जैसे उसने सारे ब्रह्मांड की ख़ुशी पा ली हो।
वरदान का आदेश
"हे बालक ध्रुव," भगवान विष्णु ने कहा, "मैं तुम्हारी कठोर तपस्या और अडिग भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो भी वरदान मांगना चाहते हो, निःसंकोच मांगो। तुम्हारे हृदय की पवित्रता और तुम्हारे अटल विश्वास ने मुझे यहाँ आने के लिए विवश कर दिया।" ध्रुव, भगवान के सामने खड़ा होकर, अभी भी भाव-विभोर था। उसने सोचा कि क्या मांगे। उसे सांसारिक सुखों की कोई इच्छा नहीं थी। उसकी एकमात्र अभिलाषा भगवान की भक्ति थी। लेकिन, भगवान विष्णु ने उसे संसार में रहकर धर्म का पालन करने और अपने कर्मों से दूसरों को प्रेरित करने का आदेश दिया, क्योंकि अभी उसका कार्य पूरा नहीं हुआ था। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि ध्रुव कौन सा वरदान मांगता है और कैसे वह स्वर्गीय धाम की ओर प्रस्थान करता है।
अध्याय 4 का सार: भगवान विष्णु का ध्रुव को दर्शन देना इस अध्याय का मुख्य भाग है। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और अटूट विश्वास से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। भगवान हमेशा अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं और उन्हें निराश नहीं करते।
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