गोवर्धन पर्वत कथा – अध्याय 3: इंद्र का क्रोध: घनघोर वर्षा

इंद्र का क्रोध: घनघोर वर्षा
पिछले अध्याय में हमने देखा कि कैसे गोकुलवासियों ने इंद्र की वर्षों से चली आ रही पूजा त्याग कर गोवर्धन पर्वत की पूजा का संकल्प लिया। कृष्ण ने सबको समझाया कि प्रकृति ही असली देवता है, और उसी की पूजा करनी चाहिए। इंद्र के अहंकार को यह बात ज़रा भी अच्छी नहीं लगी, और उसके मन में क्रोध की ज्वाला धधकने लगी। अब देखिए कि उस क्रोध का क्या परिणाम होता है।
क्रोध की ज्वाला
देवराज इंद्र अपने स्वर्लोक में सिंहासन पर आसीन थे। उनकी आंखों में क्रोध की लालिमा छा गई थी। उनका मुँह क्रोध से तमतमा रहा था। हाथ मुट्ठी बन गये थे। गोकुल के छोटे से बालक कृष्ण द्वारा उनकी पूजा का तिरस्कार उन्हें अपमान की अग्नि में जला रहा था। उन्होंने सोचा, "एक अज्ञानी बालक मुझे, इंद्र को, देवताओं के राजा को चुनौती दे रहा है? यह अपमान मैं कदापि सहन नहीं कर सकता!" क्रोध के मारे इंद्र का शरीर कांपने लगा।
इंद्र ने अपने सहायकों को आदेश दिया, "जाओ, बादलों को इकट्ठा करो! ऐसी वर्षा करो कि गोकुल का नामोनिशान मिट जाए! उस कृष्ण को और उसके गोकुलवासियों को दिखा दो कि इंद्र की शक्ति क्या होती है! उन्हें पता चलना चाहिए कि देवताओं का अपमान करने का क्या परिणाम होता है!" उनकी वाणी में क्रोध की प्रचंडता स्पष्ट थी। वो गोकुल को अपनी शक्ति का प्रमाण देना चाहते थे।
प्रलयंकारी वर्षा
इंद्र के आदेश का पालन करते हुए, काले बादल चारों दिशाओं से उमड़ पड़े। आकाश घनघोर अंधेरे से ढक गया। बिजलियाँ चमकने लगीं और बादलों की गरज से धरती कांप उठी। फिर शुरू हुई भीषण वर्षा। मूसलाधार पानी बरसने लगा। मानो आसमान फट गया हो और सारा पानी पृथ्वी पर आ गिरा हो। नदियाँ उफनने लगीं और गोकुल में बाढ़ आने लगी। हवाएँ तेज़ चलने लगी जिससे पेड़ उखड़ गए।
गोकुल के लोग भयभीत हो गए। उन्होंने पहले कभी ऐसी वर्षा नहीं देखी थी। बच्चे रोने लगे, स्त्रियाँ डर से कांपने लगीं, और पुरुष चिंता में डूब गए। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। उन्होंने कृष्ण की ओर आशा भरी नज़रों से देखा। उन्हें विश्वास था कि कृष्ण ही उन्हें इस संकट से बचा सकते हैं। कृष्ण ने गोपियों से कहा, "डरो मत! मैंने तुम से कहा था न, गोवर्धन पर्वत हमारी रक्षा करेगा, विश्वास रखो।"
गोकुल में हाहाकार
बारिश लगातार बढ़ती ही जा रही थी। गोकुल में हर तरफ पानी ही पानी था। लोगों के घर डूबने लगे, पशु बहने लगे, और जीवन अस्त-व्यस्त हो गया। गोकुलवासी अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे। उन्हें लग रहा था कि प्रलय आ गया है। उन्हें इंद्र के क्रोध का अंदाजा हो गया था। वे समझ गए थे कि यह वर्षा सामान्य नहीं है, यह इंद्र का बदला है।
कृष्ण ने सबको शांत रहने के लिए कहा और गोवर्धन पर्वत की ओर चलने को कहा। उन्होंने कहा, "चिंता मत करो। गोवर्धन पर्वत हमारी शरणस्थली है। वह हमारी रक्षा करेगा।" कृष्ण का आश्वासन सुनकर गोकुलवासियों में कुछ आशा जगी। वे सब मिलकर गोवर्धन पर्वत की ओर चल दिए, उनके मन में डर और अनिश्चितता का भाव था, लेकिन कृष्ण पर उनका विश्वास अटूट था। आगे क्या होगा? क्या कृष्ण गोकुलवासियों को बचा पाएंगे? यह हम अगले अध्याय में देखेंगे।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि इंद्र का क्रोध कितना भयंकर हो सकता है। हमने यह भी देखा कि जब हम प्रकृति का अनादर करते हैं, तो उसका क्या परिणाम होता है। इस अध्याय में, हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें हमेशा भगवान पर विश्वास रखना चाहिए, भले ही परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों।
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