सुंदरकांड – अध्याय 5: विजय सहित वापसी | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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सुंदरकांड – अध्याय 5: विजय सहित वापसी

Tilak Kathayein13 Apr 202664 views📖 1 min read
सुंदरकांड
सुंदरकांड का अध्याय 5 — विजय सहित वापसी। हनुमान लंका से लौटकर राम को सीता का संदेश और मणि देते हैं।

विजय सहित वापसी

पिछला अध्याय, 'संदेश और विनाश', लंका में हनुमान द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों का साक्षी था। माता सीता का संदेश लेकर, और लंका को उसकी दुष्टता का स्वाद चखाकर, हनुमान अब राम के पास लौटने के लिए उत्सुक थे। पवनपुत्र की आँखों में एक खास चमक थी, जो कार्य पूरा होने की संतुष्टि और अपने स्वामी के दर्शन की लालसा से उपजी थी।

पवनसुत की वापसी

समुद्र की लहरें हनुमान के विशाल शरीर को चूम रही थीं, मानों वे स्वयं उनकी वीरता की गाथा गा रही हों। वे आकाश में उठे, एक चमकते हुए तारे की भांति, अपनी गति से सबको चकित करते हुए। उनके मन में राम के मुख पर आने वाली प्रसन्नता की कल्पना थी, सीता के संदेश से मिलने वाली शांति का अनुमान था। सुग्रीव और बाकी वानर सेना किष्किन्धा की पहाड़ियों पर प्रतीक्षा कर रही थी, उनकी आंखें आकाश में टिकी हुई थीं। हनुमान की प्रतीक्षा में, उनकी बेचैनी साफ़ झलक रही थी। वे जानते थे कि हनुमान की सफलता पर ही उनकी आशा टिकी है।

हनुमान ने अपने ह्रदय में राम का नाम जपते हुए, एक लम्बी उड़ान भरी, "राम...राम...राम"। उन्होंने सोचा, "क्या मैं माता सीता का संदेश सही तरह से पहुंचा पाऊँगा? क्या राम मेरी सेवाओं से प्रसन्न होंगे?"

सन्देश और आशीर्वाद

जैसे ही हनुमान किष्किन्धा पहुंचे, वानर सेना ने जयजयकार और शंखनाद से उनका स्वागत किया। राम और लक्ष्मण भी उत्साहित थे, वे हनुमान को कुशल देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। हनुमान ने विनम्रतापूर्वक राम के चरणों में प्रणाम किया, और फिर सीता माता का संदेश सुनाया। सीता की विरह वेदना, रावण की क्रूरता, और राम के प्रति उनके अटूट प्रेम का वर्णन सुनकर राम की आंखें भर आईं। उन्होंने माता सीता को शीघ्र ही मुक्त कराने का संकल्प लिया। हनुमान ने सीता द्वारा दी गई चूड़ामणि भी राम को सौंपी, जिसे देखकर राम और भी भावुक हो गए।

हनुमान की कुशलता और भक्ति देखकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बढ़कर हनुमान को गले लगाया, उनकी पीठ थपथपाई और कहा, "हनुमान, तुमने जो कार्य किया है, वह असंभव था। तुम्हारे जैसा भक्त और सेवक पाकर मैं धन्य हूँ। तुम्हारी भक्ति और शक्ति के बल पर ही हम इस युद्ध को जीत पाएंगे। सदा मेरे हृदय में तुम्हारा वास रहेगा।" राम का आशीर्वाद पाकर हनुमान धन्य हो गए, मानो उन्होंने तीनों लोकों का सुख प्राप्त कर लिया हो।

युद्ध की तैयारी

सीता का संदेश मिलने और हनुमान की वीरता से प्रेरित होकर, अब राम ने लंका पर आक्रमण की तैयारी शुरू कर दी। वानर सेना उत्साहित थी, वे रावण के अत्याचारों का बदला लेने और सीता माता को मुक्त कराने के लिए उत्सुक थे। राम ने सुग्रीव को सेना की व्यवस्था करने का आदेश दिया, और स्वयं लक्ष्मण के साथ युद्धनीति पर विचार-विमर्श करने लगे। लंका के विनाश का समय अब निकट था, और सत्य की विजय सुनिश्चित थी।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हनुमान की लंका से विजय सहित वापसी, सीता का संदेश राम तक पहुंचाना, और राम द्वारा लंका पर आक्रमण की तैयारी का वर्णन है। यह अध्याय भक्ति, सेवा, और साहस के महत्व को दर्शाता है, और यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। हनुमान की रामभक्ति हमें प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में भी सत्य के मार्ग पर चलें।

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