सुंदरकांड – अध्याय 3: सीता की खोज | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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सुंदरकांड – अध्याय 3: सीता की खोज

Tilak Kathayein13 Apr 202638 views📖 1 min read
सुंदरकांड
सुंदरकांड का अध्याय 3 — सीता की खोज। हनुमान अशोक वाटिका में सीता की तलाश करते हैं और रावण के भयावह रूप का अवलोकन करते हैं।

सीता की खोज

लंका में प्रवेश कर हनुमान जी अब सीता माता की खोज में निकल पड़े थे। रात्रि का अंधकार गहरा था, परन्तु हनुमान जी के हृदय में राम नाम की ज्योति जगमगा रही थी। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि रघुनाथ जी की कृपा से वे जानकी माता का पता अवश्य लगा लेंगे।

अशोक वाटिका में निराशा और आशा

हनुमान जी अशोक वाटिका में प्रवेश कर गए। चाँदनी छिटक रही थी, पेड़ों की पत्तियाँ हवा में सरसराहट कर रही थीं, लेकिन सीता माता कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं। हर तरफ सुन्दर पुष्प खिले थे, पक्षी सो रहे थे, परन्तु हनुमान जी को यह सुन्दरता दुखी कर रही थी क्योंकि जानकी माता यहाँ होकर भी कहीं नहीं थीं। उनके चेहरे पर निराशा छा गई, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने स्वयं से कहा, "हे पवनपुत्र, धैर्य धारण करो। राम का भक्त कभी निराश नहीं होता।"

हनुमान जी अपने मन में सोचने लगे, "क्या मायावी रावण ने माता को कहीं छिपा दिया है? अथवा मेरे भाग्य में माता के दर्शन लिखे ही नहीं हैं? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। राम की शक्ति मेरे साथ है, मुझे ढूँढना ही होगा।"

त्रिजटा का शुभ स्वप्न

उसी रात, त्रिजटा नाम की एक राक्षसी, जो सीता माता की सेवा में नियुक्त थी, ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उसने देखा कि रावण नग्न होकर गधे पर सवार होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है, और लंका नगरी जल रही है। उसने यह भी देखा कि राम स्वयं सीता माता को ले जाने के लिए आ रहे हैं। सुबह होते ही त्रिजटा ने सीता माता को अपना स्वप्न सुनाया। स्वप्न सुनकर सीता माता के हृदय में आशा की किरण जगी।

त्रिजटा ने कहा, "हे माता, मैंने जो स्वप्न देखा है, वह अवश्य सत्य होगा। रावण का अंत निकट है, और राम जी शीघ्र ही आपको यहाँ से ले जाएंगे। आप धैर्य रखें, माता। हनुमान जी अवश्य ही आपकी सहायता के लिए आएँगे।"

रावण का क्रोध

जब रावण को पता चला कि सीता माता अब भी उसकी बात नहीं मान रही हैं, तो वह क्रोध से भर गया। वह अशोक वाटिका में आया और सीता माता को धमकाने लगा। उसने कहा, "हे सीते, तुम मेरी बात क्यों नहीं मानती? कब तक तुम इस प्रकार कष्ट सहती रहोगी? मेरे साथ विवाह कर लो, और लंका की महारानी बन जाओ। अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा।"

सीता माता ने रावण से कहा, “हे रावण, तू महान मूर्ख है जो भगवान राम के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। तू यह समझ ले कि तेरा अंत निश्चित है। राम का बाण तुझे भस्म कर देगा। राम भक्त हनुमान शीघ्र ही यहां आयेंगे और तुझे तेरा अपराध बताएँगे।" रावण क्रोधित होकर वहाँ से चला गया। वह सीता माता को धमका तो रहा था, परन्तु उसके हृदय में भय भी व्याप्त था। उसे पता था कि राम की शक्ति अपरिमित है, और उसका सामना करना उसके लिए कठिन होगा। अगले अध्याय में हनुमान जी और सीता माता का मिलन होगा, जो एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा और लंका के विनाश की नींव रखेगा।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता मैया की खोज करते हैं, त्रिजटा का स्वप्न सीता माता को आशा की किरण दिखाता है और रावण सीता माता को धमकाता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि भगवान पर अटूट विश्वास रखने से निराशा में भी आशा का संचार होता है।

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