राम सेतु निर्माण कथा – अध्याय 5: बाधाएं और सहायता

बाधाएं और सहायता
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार श्री राम के नाम की शक्ति से वानर सेना ने समुद्र पर सेतु निर्माण का आरंभ किया। पर्वत शिलाएं समुद्र में डाली जाने लगीं और 'जय श्री राम' का उद्घोष चारों दिशाओं में गूंज उठा। किन्तु यह शुभ कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो, यह देवताओं को भी अभीष्ट नहीं था। असुरों ने इस पुण्य कार्य में बाधा डालने की ठान ली थी।
असुरों का छल
समुद्र के भीतर छिपे असुरों ने वानरों के परिश्रम को विफल करने के लिए नाना प्रकार के छल करने आरम्भ कर दिए। कुछ असुर विशालकाय मछलियों का रूप धरकर शिलाओं को निगलने लगे, तो कुछ वानरों को भ्रमित कर उन्हें खाई में धकेलने लगे। अंधेरा होते ही असुरों की माया और भी प्रबल हो जाती, जिससे वानर भयभीत हो जाते और कार्य में बाधा आती। वानर सेना हताश होने लगी। उनकी श्रद्धा डिगने लगी थी। ऐसा लग रहा था मानो समुद्र, श्री राम के भक्तों की परीक्षा ले रहा था।
एक वानर ने दूसरे से कहा, "यह कैसा निर्माण है? दिन भर पत्थर ढोते हैं, और रात होते ही सब गायब हो जाता है! क्या हम कभी सेतु बना पाएंगे?" दूसरा वानर बोला, "मुझे तो लगता है कि यह समुद्र देवताओं से मिला हुआ है! वह नहीं चाहता कि हम लंका तक पुल बनाएं।" कुछ वानर भय से कांप रहे थे, उन्हें लग रहा था कि यह कार्य कदापि सफल नहीं होगा।
वानरों का प्रतिरोध
किन्तु वानर सेना में अभी भी साहस और भक्ति का ज्वार शेष था। अंगद, हनुमान और नल जैसे पराक्रमी वानर आगे आए और उन्होंने असुरों का डटकर सामना किया। हनुमान जी ने अपनी गदा से असुरों को मार भगाया, तो अंगद ने अपनी शक्ति से कई राक्षसों को धूल चटा दी। नल ने वानरों को प्रोत्साहित करते हुए कहा, "डरो मत! श्री राम का नाम जपो! यही हमारी शक्ति है।"
धीरे-धीरे वानरों में फिर से उत्साह का संचार हुआ। वे असुरों से भिड़ गए, उन्हें पत्थरों से मारने लगे। हनुमान जी ने समुद्र के भीतर डुबकी लगाई और मायावी राक्षसों को पकड़-पकड़ कर बाहर फेंकना शुरू कर दिया। जहाँ असुर निराशा फैला रहे थे, वहीं हनुमान जी "जय श्री राम" के नारे से वानरों में नव ऊर्जा का संचार कर रहे थे। श्री राम की कृपा से वानरों का मनोबल अटूट बना रहा।
जामवंत का प्रोत्साहन
जब वानर सेना थकने लगी और रात्रि के अंधकार में निराशा छाने लगी, तब जामवंत ने आगे बढ़कर सबको प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा, "हे वानरों! तुम साधारण वानर नहीं हो। तुम्हारे भीतर अपार शक्ति छिपी है। श्री राम का नाम लेकर एक बार फिर प्रयास करो। तुम अवश्य सफल होगे।" उन्होंने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया और कहा कि वे समुद्र को लांघने में समर्थ हैं, तो क्या वह इन राक्षसों का वध नहीं कर सकते?
जामवंत की बातों ने वानरों में नई ऊर्जा भर दी। उन्हें अपनी शक्तियों का स्मरण आया और वे दुगुनी शक्ति से काम में जुट गए। जामवंत ने उन्हें श्री राम के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि यह सेतु केवल पत्थर का नहीं, बल्कि भक्ति और समर्पण का सेतु है। जो कोई भी इसमें अपना योगदान देगा, वह श्री राम के स्नेह का भागीदार बनेगा। यह जामवंत का प्रोत्साहन ही था जिसने वानरों को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। वानरों को निश्चित हो गया था कि श्री राम की कृपा से यह असंभव कार्य भी संभव हो जाएगा।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार असुरों ने राम सेतु निर्माण में बाधा डालने का प्रयास किया, लेकिन वानरों ने अपने साहस और भक्ति से उनका प्रतिरोध किया। जामवंत के प्रोत्साहन ने वानरों को नई ऊर्जा दी। यह अध्याय हमें सिखाता है कि विपत्तियों के समय भी श्रद्धा और दृढ़ संकल्प से सफलता प्राप्त की जा सकती है।
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