महाभारत – अध्याय 7: भगवत गीता | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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महाभारत – अध्याय 7: भगवत गीता

Tilak Kathayein13 Apr 202645 views📖 1 min read
महाभारत
महाभारत का अध्याय 7 — भगवत गीता। अर्जुन का मोह और कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण द्वारा दिए गए भगवत गीता के उपदेशों का वर्णन इसमें है।

भगवत गीता

वनवास की अग्नि में तपकर पांडव कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में आ पहुंचे थे। सेनाएं सज चुकी थीं, दुर्योधन अपनी विशाल सेना के साथ विजय के मद में चूर था। युधिष्ठिर धर्म के पथ पर अडिग थे, पर अर्जुन के मन में एक गहरा द्वन्द चल रहा था। अब, वह क्षण आ गया था जब अर्जुन को अपने गांडीव को उठाना था, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे, उसका मन सवालों से घिरा हुआ था।

अर्जुन का मोह

कुरुक्षेत्र का मैदान योद्धाओं की गर्जना से गूंज रहा था। दोनों ओर से शंख और नगाड़े बज रहे थे। अर्जुन ने सारथी कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाने का आदेश दिया। जैसे ही रथ बीच में पहुंचा, अर्जुन ने अपने सामने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, और अपने चचेरे भाइयों को देखा। उसके मन में मोह छा गया। उसके हाथ से गांडीव छूट गया और वह रथ के फर्श पर बैठ गया, उसका चेहरा निराशा से भर गया। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, उसे अपने कर्तव्य का बोध नहीं हो रहा था।

अर्जुन ने कहा, "हे कृष्ण, मैं कैसे अपने गुरुओं और संबंधियों पर बाण चलाऊं? यह युद्ध मुझे विजय नहीं, बल्कि पाप दिलाएगा। मैं राज्य और सुख के लिए अपने ही कुल का नाश नहीं कर सकता। मुझे युद्ध नहीं करना, मुझे इस युद्ध से मुक्ति चाहिए।" उसके शब्द पीड़ा और पश्चाताप से भरे हुए थे।

कृष्ण का उपदेश

अर्जुन को मोहग्रस्त देखकर, भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य वाणी से उसे ज्ञान का मार्ग दिखाया। उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग, भक्तियोग, और ज्ञानयोग का उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि मनुष्य को अपने कर्मों के फल की चिंता किए बिना, निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि आत्मा अमर है, और मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना उसका कर्तव्य है, और उसे अपने कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए। उन्होंने उसे बताया कि यह युद्ध धर्म और अधर्म के बीच है, और उसे धर्म का साथ देना चाहिए।

कृष्ण ने कहा,"अर्जुन, यह तेरा धर्म है कि तू सत्य का साथ दे और अधर्म का नाश करे। तू केवल एक निमित्त मात्र है। कर्म कर, फल की चिंता मत कर। इस युद्ध में तू अपने परिवार के सदस्यों को नहीं, बल्कि अधर्म को मार रहा है।" कृष्ण की वाणी में अमृत था, उनके शब्द अर्जुन के हृदय में उतर गए।

विराट रूप का दर्शन

अर्जुन को ज्ञान देने के बाद, भगवान कृष्ण ने उसे अपने विराट रूप का दर्शन कराया। अर्जुन ने कृष्ण के उस रूप को देखा, जिसमें पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ था। उसने देखा कि उनमे सारे देव, दानव, ग्रह, नक्षत्र, और समय भी समाहित हैं। यह दृश्य इतना भयानक और अद्भुत था कि अर्जुन भय और विस्मय से भर गया। उसने कृष्ण के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और उनसे प्रार्थना की कि वे अपना सौम्य रूप धारण करें। इस विराट रूप के दर्शन से अर्जुन का सारा मोह दूर हो गया और उसे अपने कर्तव्य का बोध हो गया।

अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा, "हे भगवान, मैं आपकी महिमा नहीं जानता था। आज मैंने आपके दिव्य रूप के दर्शन किए और मेरा अज्ञान दूर हो गया। अब मैं समझ गया हूं कि यह युद्ध केवल मेरा नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए है। आप ही इस जगत के पालनहार हैं, और मैं आपकी शरण में हूं।" कृष्ण ने मुस्कुराकर अर्जुन को आश्वासन दिया और कहा कि वह हमेशा उसके साथ हैं।

कुरुक्षेत्र की ओर

भगवत गीता के ज्ञान से अर्जुन का मन शांत हो गया था। उसने गांडीव उठाया, धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, और युद्ध के लिए तैयार हो गया। अब वह एक योद्धा था, जो धर्म के लिए लड़ने को तत्पर था। कुरुक्षेत्र का मैदान युद्ध के लिए तैयार था, और अब पांडवों और कौरवों के बीच निर्णायक युद्ध होने वाला था जिसने पूरे भारतवर्ष के इतिहास को बदल दिया। अगले अध्याय में, हम कुरुक्षेत्र के युद्ध को देखेंगे, जिसमें धर्म और अधर्म के बीच महासंग्राम होगा और सत्य की विजय होगी।

अध्याय 7 का सार: इस अध्याय में हमने अर्जुन के मोह और कृष्ण के उपदेश को देखा। कृष्ण ने अर्जुन को कर्म, भक्ति, और ज्ञान योग का मार्ग दिखाया और उसे अपने विराट रूप का दर्शन कराया। इस ज्ञान से अर्जुन का मोह दूर हो गया और वह युद्ध के लिए तैयार हो गया। इस अध्याय का मुख्य आध्यात्मिक संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन निष्काम भाव से करना चाहिए और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।

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