महाभारत – अध्याय 3: कृष्ण का मथुरा प्रस्थान

कृष्ण का मथुरा प्रस्थान
पिछले अध्याय में हमने कृष्ण की वृंदावन की मनमोहक लीलाओं का आनंद लिया, जहाँ उन्होंने गोपियों के दिलों में प्रेम और भक्ति का संचार किया। यमुना किनारे, कदंब के पेड़ों की छाँव में, और रासलीला के अद्भुत नृत्यों में कृष्ण ने वृंदावन को अपनी मधुर उपस्थिति से धन्य कर दिया था। परन्तु, अब समय आ गया था कि वे अपने जीवन के एक नए अध्याय की ओर बढ़ें, एक ऐसा अध्याय जिसमें उन्हें मथुरा जाकर अत्याचारी कंस का अंत करना था और धर्म की पुनर्स्थापना करनी थी।
अक्रूर का आगमन
वृंदावन में, प्रातःकाल की सुनहरी धूप धीरे-धीरे फैल रही थी। पक्षी मधुर गीत गा रहे थे और गोपियों के घरों में दही मथने की आवाज़ें गूंज रही थीं। अचानक, नंदबाबा के द्वार पर एक रथ आकर रुका। रथ से उतरे व्यक्ति को देखते ही वृंदावन के निवासियों में उत्सुकता छा गई। वे व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि कंस के विश्वसनीय मंत्री अक्रूर थे। उनके चेहरे पर एक गम्भीर भाव था। उन्हें कंस ने कृष्ण और बलराम को मथुरा ले जाने के लिए भेजा था। अक्रूर का हृदय कृष्ण के दर्शन के लिए लालायित था, परन्तु वह कंस के भय से भी त्रस्त थे।
नंदबाबा ने अक्रूर का स्वागत किया और कुशलक्षेम पूछी। अक्रूर ने कहा, "नंदबाबा, कंस महाराज ने आपको और कृष्ण-बलराम को मथुरा आमंत्रित किया है। वे एक विशाल धनुष यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें वे आपकी उपस्थिति और कृष्ण-बलराम के बल-पराक्रम का प्रदर्शन देखना चाहते हैं।" नंदबाबा आश्चर्यचकित हो गए। कृष्ण और बलराम भी अक्रूर के पास आए। कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अक्रूर से पूछा, "क्या यह सच है कि कंस महाराज ने हमें बुलाया है? हमें खुशी है कि हमें मथुरा जाने का अवसर मिलेगा।" कृष्ण जानते थे कि यह यात्रा केवल एक यज्ञ में भाग लेने के लिए नहीं है, बल्कि कंस के पापों का घड़ा भरने और धर्म की स्थापना करने का एक अवसर है।
मथुरा में संकट
अक्रूर कृष्ण और बलराम को रथ में लेकर मथुरा की ओर चल पड़े। वृंदावन की गोपियाँ कृष्ण के वियोग में व्याकुल हो उठीं। उनकी आँखों में आँसू थे और हृदय में निराशा का भाव। जैसे ही वे मथुरा पहुँचे, कृष्ण ने शहर में फैली अशांति और भय को महसूस किया। कंस का अत्याचारी शासन हर तरफ फैला हुआ था। प्रजा त्रस्त थी और धर्म का पालन करना कठिन हो गया था। मथुरा में प्रवेश करते ही कृष्ण और बलराम ने एक कुबड़ी दासी को देखा, जिसका नाम कुब्जा था। कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से कुब्जा को सुंदर बना दिया। कुब्जा कृष्ण की कृपा से अभिभूत हो गई और उसने उन्हें चंदन का लेप दिया।
मथुरा के बाजारों में घूमते हुए कृष्ण और बलराम को कंस के दुष्ट योद्धाओं ने रोकने का प्रयास किया। उन्होंने मल्ल युद्ध के लिए कृष्ण और बलराम को चुनौती दी। कृष्ण और बलराम ने उन योद्धाओं को आसानी से पराजित कर दिया। यह देखकर कंस के अत्याचार के विरुद्ध प्रजा में साहस का संचार हुआ। कृष्ण की उपस्थिति ने मथुरा में एक नई आशा का संचार किया। लोगों को यह विश्वास होने लगा कि अब कंस के अत्याचार का अंत निकट है। कृष्ण ने यह सुनिश्चित किया कि उनके कार्यों से जनता को यह संदेश मिले कि धर्म और न्याय की स्थापना अवश्य होगी।
कंस का अंत और उग्रसेन की पुनर्स्थापना
अंत में, धनुष यज्ञ का दिन आ गया। कंस अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था, उसके चेहरे पर अहंकार और भय का मिश्रण था। कृष्ण और बलराम ने धनुष यज्ञ स्थल में प्रवेश किया। कृष्ण ने उस विशाल धनुष को उठाया और एक ही झटके में तोड़ डाला। धनुष के टूटने की आवाज़ सुनकर कंस क्रोध से भर गया। कृष्ण ने कंस को चुनौती दी और दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंत में, कृष्ण ने कंस को अपने सिंहासन से खींचकर नीचे गिरा दिया और उसका वध कर दिया। कंस के वध के साथ ही मथुरा में अत्याचार का अंत हो गया।
कंस के वध के बाद, कृष्ण ने उसके पिता उग्रसेन को कारागार से मुक्त किया और उन्हें पुनः मथुरा के सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। उग्रसेन ने न्याय और धर्म के मार्ग पर चलते हुए शासन किया। मथुरा में शांति और समृद्धि का युग लौट आया। कृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा के लिए उन्हें किसी भी हद तक जाना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी दिखाया कि अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है। कृष्ण की कृपा से मथुरा एक बार फिर धर्म और न्याय का केंद्र बन गया।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे अक्रूर कृष्ण और बलराम को मथुरा ले जाते हैं, जहाँ कृष्ण कंस का वध करते हैं और उग्रसेन को सिंहासन पर पुनर्स्थापित करते हैं। इस अध्याय का आध्यात्मिक संदेश यह है कि धर्म की रक्षा के लिए हमें अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना चाहिए। अगला अध्याय कृष्ण और पांडवों के संबंधों पर प्रकाश डालेगा, जो महाभारत के युद्ध की नींव रखेगा।
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