कर्ण दानवीर कथा – अध्याय 5: इंद्र का छल और कवच

इंद्र का छल और कवच
अंगराज बनने के बाद कर्ण की दानवीरता और कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई। देवता भी कर्ण के इस गुण से परिचित थे। परन्तु इंद्र, अर्जुन के पिता होने के कारण, चिंतित थे कि कर्ण की शक्ति अर्जुन को युद्ध में पराजित कर सकती है। इसलिए, उन्होंने एक योजना बनाई, एक छल रचा, जिससे कर्ण की अद्वितीय शक्ति, उसके कवच और कुंडल, प्राप्त किए जा सकें।
देवराज इंद्र का आगमन
प्रात: काल, जब सूर्य देव अपनी स्वर्णिम किरणों से धरती को प्रकाशित कर रहे थे, कर्ण गंगा किनारे अपनी नित्य पूजा में लीन थे। उनके मन में भक्ति और श्रद्धा का भाव था। तभी उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण आते हुए दिखाई दिए। ब्राह्मण वृद्ध थे, उनकी जटाएँ बढ़ी हुई थीं, और उनके चेहरे पर तेज था, परन्तु उनके शरीर में दुर्बलता स्पष्ट झलक रही थी। कर्ण ने तत्काल अपने आसन से उठकर ब्राह्मण का स्वागत किया, उनके चरणों को स्पर्श किया और उन्हें आदरपूर्वक आसन पर बैठाया।
कर्ण ने विनम्रता से कहा, "हे ब्राह्मण देवता, आपका आगमन मेरे लिए सौभाग्य की बात है। आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब आपका है।" मन ही मन कर्ण को यह आभास हो रहा था कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं, परन्तु अतिथी देवो भव: की भावना ने उन्हें आगे कुछ सोचने से रोक दिया। उनकी दानवीरता की परीक्षा होने वाली थी।
कवच और कुंडल का दान
ब्राह्मण, जो वास्तव में देवराज इंद्र थे, ने अपनी आवाज में थोड़ा कंपन लाते हुए कहा, "हे कर्ण, मैं तुम्हारी दानवीरता से बहुत प्रभावित हूँ। मैंने सुना है कि तुम कभी किसी को निराश नहीं करते। मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ, और मुझे विश्वास है कि तुम मुझे निराश नहीं करोगे।" कर्ण ने बिना किसी हिचकिचाहट के उत्तर दिया, "हे ब्राह्मण देवता, आप जो भी माँगेंगे, मैं आपको अवश्य दूंगा। मेरे प्राण भी आपके लिए हाजिर हैं।" इंद्र ने एक गहरी सांस ली और बोले, "मुझे तुम्हारे वे कवच और कुंडल चाहिए, जो जन्म से तुम्हारे शरीर का हिस्सा हैं।"
यह सुनकर कर्ण क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गए। उन्हें पता था कि कवच और कुंडल उनकी शक्ति का स्रोत हैं। उनके रहते उन्हें कोई भी पराजित नहीं कर सकता था। परन्तु उन्होंने वचन दिया था, और कर्ण अपने वचन से कभी पीछे नहीं हटते थे। सूर्य देव, अपने पुत्र की इस परीक्षा को आकाश से देख रहे थे। उनका हृदय गर्व और दुःख से भर गया। वे जानते थे कि इंद्र छल कर रहे हैं, परन्तु वे कर्ण को अपने वचन से डिगने के लिए नहीं कह सकते थे। धर्म का मार्ग कठिन अवश्य होता है, परन्तु अंत में विजय उसी की होती है।
इंद्र की शक्ति
कर्ण ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने कवच और कुंडल उतार दिए और उन्हें ब्राह्मण रूपी इंद्र को सौंप दिए। इंद्र, कर्ण की दानवीरता से चकित थे। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि कर्ण बिना किसी प्रश्न के अपने प्राणों की रक्षा करने वाले कवच और कुंडल दान कर देंगे। कृतज्ञता स्वरुप, इंद्र ने कर्ण को एक अमोघ शक्ति प्रदान की। उन्होंने कहा, "हे कर्ण, तुम्हारी दानवीरता से प्रसन्न होकर, मैं तुम्हें यह शक्ति देता हूँ। तुम इसका प्रयोग केवल एक बार कर पाओगे, और इसका वार कभी निष्फल नहीं होगा। परन्तु याद रखना, तुम इसका प्रयोग केवल अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण युद्ध में ही करना।" कर्ण ने इंद्र को धन्यवाद दिया और अमोघ शक्ति को स्वीकार किया। कर्ण जानते थे कि इंद्र ने छल से उनसे उनके कवच कुंडल प्राप्त किए हैं, परन्तु फिर भी उन्होंने देवराज का सम्मान किया। इसके बाद इंद्र अंतर्ध्यान हो गए। अब कर्ण और कुंती के मध्य एक मार्मिक वार्तालाप का अध्याय खुलने वाला था।
अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में, इंद्र ब्राह्मण के वेश में कर्ण से छलपूर्वक उसके कवच और कुंडल प्राप्त करते हैं। कर्ण अपनी दानवीरता के वचन का पालन करते हुए बिना किसी हिचकिचाहट के अपना सब कुछ दान कर देता है। यह दिखाता है कि दानवीरता सबसे बड़ा धर्म है, और हमें अपने वचन का पालन हर कीमत पर करना चाहिए।
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