कामाख्या देवी कथा – अध्याय 5: अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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कामाख्या देवी कथा – अध्याय 5: अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति

Tilak Kathayein13 Apr 202634 views📖 1 min read
कामाख्या देवी कथा
कामाख्या देवी कथा का अध्याय 5 — अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति। यह अध्याय कामाख्या मंदिर में अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति और महत्व का वर्णन करता है, जो देवी के मासिक धर्म का प्रतीक है।

अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति

नरकासुर के अत्याचारों से मुक्ति पाकर कामाख्या भूमि फिर से शांत हो गई थी। देवी कामाख्या की कृपा से प्रजा सुख-शान्ति से जीवन यापन कर रही थी, परन्तु देवी के गर्भ गृह में एक गहन रहस्य छिपा था, जो समय आने पर प्रकट होना था। यही रहस्य आगे चलकर अम्बुबाची उत्सव का आधार बना।

मासिक धर्म का रहस्योद्घाटन

एक दिन, मंदिर के पुजारी, आचार्य कमलाकांत, देवी के गर्भ-गृह में नित्य पूजा के लिए प्रवेश कर रहे थे। वातावरण में एक अजीब सी सुगंध व्याप्त थी, मानो किसी अज्ञात शक्ति का आभास हो रहा हो। गर्भ-गृह में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा कि देवी की योनि-शिला से रक्त प्रवाहित हो रहा है! आचार्य कमलाकांत भय और आश्चर्य से स्तंभित हो गए। उनके हाथ से पूजा की थाली गिर गई और वे मूर्छित होकर गिर पड़े।

जब उन्हें होश आया, तो वे कांपते हुए बोले, "हे देवी, यह क्या हो रहा है? क्या यह कोई अपशकुन है?" उनके मन में भय के साथ-साथ श्रद्धा भी उमड़ रही थी। यह घटना साधारण नहीं थी, यह देवी कामाख्या की शक्ति और मातृत्व का प्रतीक थी। उसी क्षण, आकाशवाणी हुई:

"हे कमलाकांत, भयभीत मत हो। यह मेरी शक्ति का प्रकटीकरण है। मैं स्त्री हूं, और सृजन का चक्र मेरे भीतर चलता है। यह रक्तस्राव मेरे मासिक धर्म का प्रतीक है, जो पृथ्वी को उर्वर बनाता है और जीवन को जन्म देता है।"

अम्बुबाची मेले का प्रारंभ

आकाशवाणी के बाद, आचार्य कमलाकांत ने देवी के आदेशानुसार तीन दिनों के लिए मंदिर के पट बंद कर दिए। उन्होंने घोषणा की कि देवी कामाख्या रजस्वला हैं और इन तीन दिनों में धरती माता भी विश्राम करती हैं। इसलिए, इस अवधि में सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान, कृषि कार्य और धरती को खोदने वाले कार्य वर्जित रहेंगे। तीन दिनों के बाद, मंदिर के पट खोले गए और देवी की विशेष पूजा अर्चना की गई। इस दिन को अम्बुबाची उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।

अम्बुबाची मेला कामाख्या देवी के स्त्रीत्व और सृजन शक्ति का उत्सव है। यह मेला हर साल आषाढ़ महीने में लगता है और लाखों श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि इन दिनों में देवी कामाख्या धरती को उपजाऊ बनाती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। देवी कामाख्या ने स्वयं कहा, "जो भी भक्त इन दिनों में श्रद्धापूर्वक मेरी आराधना करेगा, उसे संतान सुख, धन-धान्य और सौभाग्य की प्राप्ति होगी।"

मंदिर की प्रथाएं और निषेध

अम्बुबाची के दौरान मंदिर में कई विशेष प्रथाएं और निषेधों का पालन किया जाता है। इन तीन दिनों में भक्त कामाख्या मंदिर के आसपास ही निवास करते हैं और देवी के नाम का जाप करते हैं। इस दौरान खाना बनाने, खाने, खेती करने और किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम करने की मनाही होती है। साधु और सन्यासी इन दिनों में विशेष साधना करते हैं और देवी के मंत्रों का जाप करते हैं। मंदिर के पट खुलने के बाद, भक्तों को 'अंगोदक' और 'अंगवस्त्र' प्रसाद के रूप में दिया जाता है। अंगोदक देवी के रजस्वला होने के दौरान योनि-शिला को धोए गए जल को कहते हैं, जबकि अंगवस्त्र उस वस्त्र का टुकड़ा होता है जो योनि-शिला को ढँकता है। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे देवी की शक्ति से प्रभावित होकर विश्वकर्मा मंदिर का पुनर्निर्माण करते हैं।

अध्याय 5 का सार: इस अध्याय में हमने देवी कामाख्या के मासिक धर्म के रहस्योद्घाटन और अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति के बारे में जाना। यह उत्सव देवी के स्त्रीत्व और सृजन शक्ति का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि हमें प्रकृति के चक्रों का सम्मान करना चाहिए और देवी माँ की शक्ति में अटूट विश्वास रखना चाहिए।

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