कामाख्या देवी कथा – अध्याय 4: नरकासुर का उदय और पतन

नरकासुर का उदय और पतन
कामदेव के पुनर्जन्म के श्राप के साथ ही, कामरूप की भूमि पर एक नए आतंक का साया मंडराने लगा। उस श्राप का परिणाम नरकासुर के रूप में सामने आया, जो पृथ्वी देवी और भगवान विष्णु के वराह अवतार के पुत्र थे, परन्तु आसुरी गुणों से परिपूर्ण थे। उसका उदय कामरूप के स्वर्णिम युग की समाप्ति और अत्याचारों के एक नए युग का आरंभ था।
कामरूप पर नरकासुर का आक्रमण
नरकासुर का आगमन एक प्रचंड तूफान के समान था। उसने कामरूप की शांति भंग कर दी। उसकी विशाल सेना ने चारों ओर तबाही मचा दी। हरे-भरे खेत खून से लाल हो गए, और मंदिरों में प्रार्थनाओं की जगह चीखों ने ले ली। कामरूप के लोग भयभीत थे, उनका हृदय निराशा से भर गया था। वे अपनी रक्षा के लिए беспомощны महसूस कर रहे थे। हर तरफ मृत्यु और विनाश का तांडव था, मानो किसी ने शांति की आत्मा को ही रौंद डाला हो।
"यह कैसा राक्षस है जो हमारी धरती को खून से रंग रहा है?" एक बूढ़े किसान ने रोते हुए कहा। "क्या देवताओं को हमारी पुकार सुनाई नहीं दे रही? क्या वे हमें इस भयानक संकट से नहीं बचाएंगे?" उसके शब्द हवा में गूंज रहे थे, निराशा और भय से भरे हुए।
देवताओं का उत्पीड़न और कामाख्या का आह्वान
नरकासुर ने केवल मनुष्यों पर ही अत्याचार नहीं किए, बल्कि देवताओं को भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का प्रयास किया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण करने की योजना बनाई, इंद्र को परास्त करने और स्वर्ग के अमृत पर कब्ज़ा करने की अभिलाषा पाल रखी थी। उसने सोलह हजार राजकुमारियों को बंदी बनाकर अपने महल में रखा और उन्हें अपनी दासियाँ बनाने का प्रयास किया। देवताओं की माता अदिति के बहुमूल्य कुंडल छीन लिए। इंद्र सहित सभी देवता भयभीत थे और शक्तिहीन महसूस कर रहे थे। उन्होंने देवी कामाख्या की शरण ली, उनसे प्रार्थना की कि वे नरकासुर के अत्याचारों से उन्हें मुक्ति दिलाएं।
घने जंगलों के बीच स्थित कामाख्या मंदिर में देवताओं ने माँ कामाख्या की स्तुति की। "हे माँ, हमारी रक्षा करो! इस राक्षस से हमें बचाओ! हम आपके चरणों में गिड़गिड़ाते हैं।" उनकी प्रार्थनाएं पूरे ब्रह्मांड में गूंज उठीं, देवी कामाख्या के हृदय को द्रवित कर दिया। कामाख्या ने उन्हें आश्वासन दिया कि भगवान कृष्ण ही नरकासुर का अंत करेंगे और धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे।
भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध
जब अत्याचार असहनीय हो गया, तब भगवान कृष्ण ने सत्यभामा के साथ नरकासुर के राज्य पर आक्रमण किया। भीषण युद्ध हुआ, जिसमें कृष्ण और नरकासुर के बीच भयंकर द्वंद्व हुआ। कृष्ण के सुदर्शन चक्र ने नरकासुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। नरकासुर का वध होते ही पृथ्वी पर शांति लौट आई। बंदी राजकुमारियों को मुक्त कर दिया गया, और स्वर्गलोक के आभूषण वापस देवताओं को सौंप दिए गए। धर्म की पुनर्स्थापना हुई, और लोगों ने राहत की सांस ली।
नरकासुर के वध के बाद, भगवान कृष्ण ने कामाख्या देवी का आशीर्वाद लिया और उनकी महिमा का गुणगान किया। कामाख्या ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि उनकी कृपा हमेशा कामरूप पर बनी रहेगी। देवी ने सत्यभामा को नरकासुर द्वारा लूटे गए देवताओं की माता अदिति के कुंडल वापस सौंपने के लिए निर्देशित किया।
अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति
नरकासुर के वध के बाद, कामरूप एक नए युग में प्रवेश कर गया। भगवान कृष्ण के आशीर्वाद और कामाख्या देवी की कृपा से, धरती फिर से हरी-भरी हो गई। लेकिन नरकासुर के अत्याचारों की स्मृति लोगों के दिलों में बनी रही, और उनसे मुक्ति दिलाने वाली कामाख्या देवी के प्रति उनकी श्रद्धा और भी बढ़ गई। यह श्रद्धा ही अम्बुबाची उत्सव की उत्पत्ति का कारण बनेगी, जो देवी के मासिक धर्म के समय मनाया जाता है, जिसकी कहानी अगले अध्याय में बताई जाएगी।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे नरकासुर के अत्याचारों ने कामरूप को त्रस्त कर दिया, लेकिन भगवान कृष्ण ने कामाख्या देवी की कृपा से उसका वध करके धर्म की पुनर्स्थापना की। यह कहानी सिखाती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही जीत होती है।
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