गोवर्धन पर्वत कथा – अध्याय 4: कृष्ण ने उठाया गोवर्धन

कृष्ण ने उठाया गोवर्धन
भयंकर वर्षा से त्रस्त, गोकुलवासी भयभीत होकर कान्हा की ओर देख रहे थे। इंद्र का प्रकोप अपने चरम पर था, और हर क्षण प्रलयंकारी लग रहा था। पिछली रात से लगातार बरस रही जलधारा ने गोकुल को डुबोने की ठान ली थी, और लोगों को लग रहा था कि अब यही उनका अंत है।
गोवर्धन पर्वत की छाया
कान्हा ने सबकी आँखों में आशा की किरण देखी। वे जानते थे कि अब कुछ करना होगा। उन्होंने ग्वालों और गोपियों को आश्वस्त करते हुए कहा, "डरो मत! मैं हूँ न! यह इंद्र का क्रोध है, परन्तु प्रेम और भक्ति की शक्ति से बड़ा नहीं।" उनकी वाणी में अद्भुत आत्मविश्वास था, जो भयभीत जनों को शांत कर रहा था। कान्हा के मुख पर मुस्कान थी, मानो कोई खेल खेलने जा रहे हों, जबकि वास्तविकता में उनके कंधों पर समस्त गोकुल की रक्षा का भार था। बारिश की तेज़ बौछारें उनके सांवले चेहरे को भिगो रही थीं, परन्तु उनके नेत्र स्थिर और दृढ़ थे।
कान्हा ने मन ही मन सोचा, "इंद्र अहंकार में डूबे हुए हैं। उन्हें अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना है, परन्तु उन्हें यह नहीं पता कि प्रेम के आगे सब शक्ति व्यर्थ है। मैं उन्हें दिखाऊंगा कि प्रकृति पर उनका एकाधिकार नहीं है, और गोकुल की रक्षा करना मेरा धर्म है।" फिर उन्होंने ऊँची आवाज में कहा, "सब लोग गोवर्धन पर्वत की ओर चलो! वही हमारी रक्षा करेंगे!"
कृष्ण द्वारा पर्वत धारण
क्षण भर में, कान्हा ने अपनी छोटी उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। यह दृश्य देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। बूढ़े, बच्चे, महिलाएं - हर कोई कान्हा की अद्भुत शक्ति को देख कर दंग रह गया। यह कोई साधारण कार्य नहीं था; यह तो साक्षात भगवान का अवतार ही कर सकता था। पर्वत को उठाते ही, कान्हा ने गोकुलवासियों को पर्वत के नीचे आश्रय लेने के लिए बुलाया। "आओ! सब लोग पर्वत के नीचे आ जाओ! यहाँ इंद्र की वर्षा का कोई प्रभाव नहीं होगा!"
गोकुलवासी धीरे-धीरे पर्वत के नीचे एकत्रित होने लगे। वे अपने पशुओं और सामान के साथ आकर कान्हा के द्वारा बनाए गए सुरक्षित स्थान में खड़े हो गए। कान्हा ने मुस्कुराते हुए कहा, "डरो मत! मैं इस पर्वत को तब तक धारण करूँगा, जब तक इंद्र का क्रोध शांत नहीं हो जाता। यह मेरी प्रतिज्ञा है!" कान्हा की कृपा से, सभी गोकुलवासी सुरक्षित थे। वर्षा की प्रचंडता के बावजूद, पर्वत के नीचे शांति और सुरक्षा का वातावरण था।
इंद्र की हार
इंद्र, जो अपनी शक्ति के मद में चूर थे, यह देखकर चकित रह गए कि एक बालक ने उनकी वर्षा को व्यर्थ कर दिया है। उनकी सारी कोशिशें निष्फल हो गईं। वे समझ गए कि उनका सामना किसी साधारण व्यक्ति से नहीं है। धीरे-धीरे, इंद्र का क्रोध कम होने लगा और उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि वह कान्हा की शक्ति के आगे हार मान चुके हैं। परन्तु अभी भी उनके मन में अहंकार का थोड़ा सा अंश बाकी था। क्या इंद्र अपनी हार स्वीकार करेंगे? क्या वे कृष्ण से क्षमा याचना करेंगे? यह प्रश्न अगले अध्याय में सामने आएगा, जहाँ इंद्र का अहंकार टूटेगा और उन्हें सत्य का ज्ञान होगा।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर गोकुलवासियों को इंद्र के क्रोध से बचाया। यह घटना शक्ति के मुकाबले प्रेम और भक्ति की विजय का प्रतीक है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, और अहंकार का नाश निश्चित है।
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