चामुंडा माता कथा – अध्याय 4: चामुंडा का भीषण युद्ध

चामुंडा का भीषण युद्ध
पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार चंड और मुंड नामक दो भयंकर असुरों ने माता पार्वती के ध्यान में विघ्न डाला और उन्हें अपमानित करने का प्रयास किया। उनका दुस्साहस देखकर देवी अत्यंत क्रोधित हुईं, और अब यह क्रोध ऐसा रूप धारण करेगा, जिसकी कल्पना भी तीनों लोकों में किसी ने नहीं की थी। युद्ध का शंखनाद होने वाला था, और चामुंडा का भीषण रूप प्रकट होने वाला था।
देवी का क्रोधित रूप धारण
चंड और मुंड के अहंकार भरे वचनों को सुनकर माँ पार्वती का मुख मंडल क्रोध से लाल हो उठा।उनकी भौहें तन गईं, और नेत्रों से ज्वाला निकलने लगी। समस्त ब्रह्माण्ड में एक प्रचंड ऊर्जा का संचार हुआ। ऐसा लगा मानो प्रलय का आगमन हो गया हो। पर्वतराज हिमालय भी देवी के क्रोध की प्रचंडता से कांप उठे। हवा में एक चीत्कार गूंजी, और दशों दिशाएँ भयभीत हो गईं।
देवी ने अपने मन में सोचा, "इन दुष्टों ने मेरी तपस्या को भंग किया है, और मेरे भक्तों को कष्ट पहुंचाया है। अब इनके पापों का घड़ा भर चुका है। मैं इन्हें इनके कर्मों का फल अवश्य दूंगी।" उनके मन में संकल्प उठा, और उनका शरीर तेज़ी से बदलने लगा।
चंड का वध
देवी के शरीर से एक भयंकर काली शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति विकराल रूप धारण करके एक प्रचंड देवी - चामुंडा - के रूप में परिवर्तित हो गई। उनके काले केश हवा में लहरा रहे थे, और उनकी जीभ मुँह से बाहर लटक रही थी। उन्होंने नरमुंडों की माला पहनी हुई थी, और उनके हाथों में खड्ग, त्रिशूल और अन्य घातक अस्त्र थे। चंड, यह भयानक दृश्य देखकर भयभीत हो गया, फिर भी उसने आक्रमण करने का साहस बटौरा।
चंड ने देवी चामुंडा पर तीरों की वर्षा कर दी, लेकिन देवी ने सहजता से उन तीरों को काट डाला। फिर, पलक झपकते ही, देवी ने अपने त्रिशूल से चंड का सिर धड़ से अलग कर दिया। चंड का कटा हुआ सिर ज़मीन पर लुढ़क गया, और उसकी चीख हवा में गूँज उठी। देवी चामुंडा की जय-जयकार से आकाश गुंजायमान हो उठा। यह देवी का क्रोध और उनकी शक्ति का प्रमाण था, जो अपने भक्तों और धर्म की रक्षा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।
मुंड का वध
चंड का वध होते देखकर मुंड भय से कांप उठा। उसने भागने का प्रयास किया, लेकिन देवी चामुंडा ने उसे अपने पाश में जकड़ लिया। देवी ने मुंड को धरती पर पटक दिया, और उस पर अपने पैरों से प्रहार किया। मुंड चीखता रहा लेकिन देवी ने उस पर कोई दया नहीं दिखाई। उन्होंने अपने खड्ग से मुंड का सिर भी धड़ से अलग कर दिया। उसके रक्त से धरती लाल हो गई।
देवी चामुंडा के मुख पर विजय की मुस्कान थी। उन्होंने चंड और मुंड के कटे हुए सिरों को अपने हाथों में उठा लिया, और एक भयंकर अट्टहास किया। यह अट्टहास तीनों लोकों में गूंज उठा, और असुरों की सेना में भय का संचार हो गया। देवी ने अपने भक्तों को संदेश दिया कि जो कोई भी धर्म का अपमान करेगा, उसे इसी प्रकार दंडित किया जाएगा। देवी चामुंडा की कृपा से धरती एक बार फिर सुरक्षित हो गई, और धर्म की स्थापना हुई।
चामुंडा की विजय की तैयारी
चंड और मुंड के वध के पश्चात, देवी चामुंडा ने असुरों की सेना का संहार करने का संकल्प लिया। अब महिषासुर के विनाश का मार्ग प्रशस्त हो गया था। देवतागण, मनुष्य, और ऋषि-मुनि, सभी देवी चामुंडा की जय-जयकार कर रहे थे। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि किस प्रकार देवी चामुंडा ने पूरे असुर कुल का नाश किया, और धरती पर शांति स्थापित की, और किस प्रकार चामुंडा की विजय का उत्सव मनाया गया।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे देवी पार्वती ने क्रोधित होकर चामुंडा का रूप धारण किया और चंड-मुंड का वध किया। यह हमें सीखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले हमेशा विजयी होते हैं। देवी का क्रोध अधर्म और अन्याय के प्रति था, और उनकी कृपा धर्म और न्याय की रक्षा करने के लिए है।
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