चामुंडा माता कथा – अध्याय 3: चंड और मुंड का आक्रमण

चंड और मुंड का आक्रमण
पिछले अध्याय में हमने देखा कि कैसे देवी पार्वती से अम्बिका का भव्य स्वरूप प्रकट हुआ, उनका तेज तीनों लोकों में फ़ैल गया। अब, महिषासुर के दो क्रूर सेनापति, चंड और मुंड, उस दिव्य प्रकाश की खोज में आगे बढ़ते हैं, अनजान जो आने वाला है वह उनके विनाश का कारण बनेगा।
चंड और मुंड की दृष्टि
दूर क्षितिज पर, चंड और मुंड ने एक अद्भुत दृश्य देखा। एक पहाड़ की चोटी, जहाँ सूर्य की किरणें सोने सी चमक रही थीं, वहाँ एक दिव्य स्त्री खड़ी थी। उसका तेज ऐसा था कि आँखें चकाचौंध हो जाएँ, और उसका सौंदर्य ऐसा कि स्वर्ग की अप्सराएँ भी लज्जित हो जाएँ। चंड, जो अपनी क्रूरता के लिए जाना जाता था, पल भर के लिए ठिठक गया। मुंड, जो अधिक चालाक था, उसकी आँखों में लालच चमक उठी।
मुंड ने चंड से कहा, "देखो, चंड! यह स्त्री कितनी सुन्दर है! यह तो स्वर्ग की शोभा है, जो हमारे स्वामी, महिषासुर के योग्य है। हमें इसे तुरंत ले जाकर महिषासुर के चरणों में अर्पित करना चाहिए।" चंड अपनी क्रूरता समेटते हुए बोला, "हाँ, मुंड। तू ठीक कहता है। ऐसी रत्न को तो अवश्य ही हमारे स्वामी के पास होना चाहिए। चलो, हम इसे पकड़ कर लाते हैं।" उनके हृदय में काम और लोभ की भावना जाग उठी, और वे उस देवी को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठे।
संदेशवाहक का प्रस्थान
चंड और मुंड ने अपने एक संदेशवाहक को देवी अम्बिका के पास भेजा। संदेशवाहक डरा-सहमा देवी के निकट पहुंचा, उसके मुख से शब्द भी ठीक से नहीं निकल रहे थे। उसने कांपते हुए स्वर में कहा, “हे देवी! महिषासुर के सेनापति चंड और मुंड आपको अपने स्वामी के पास ले जाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि आप महिषासुर की पत्नी बनकर उनकी सेवा करें। आपको हमारे साथ चलना होगा।”
देवी अम्बिका मंद-मंद मुस्कुराईं। उनके चेहरे पर क्रोध का लेशमात्र भी न था, बल्कि करुणा का भाव था। उन्होंने शांत स्वर में कहा, "मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो मुझसे युद्ध में जीतेगा, मैं उसी से विवाह करूंगी। यदि महिषासुर और उसके सेनापति मुझ से विवाह करना चाहते हैं, तो उन्हें मुझसे युद्ध करना होगा।" देवी की वाणी में एक ऐसी शक्ति थी कि संदेशवाहक भय से कांपने लगा और तुरंत चंड और मुंड के पास लौट गया। यह देवी का एक तरीका था, उन्हें युद्ध के लिए ललकारने का, और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने का।
राक्षसों का आक्रमण
संदेशवाहक के लौटने पर चंड और मुंड क्रोध से भर उठे। उन्होंने अपनी विशाल सेना को देवी पर आक्रमण करने का आदेश दिया। क्षण भर में, असंख्य राक्षस गर्जना करते हुए देवी की ओर दौड़े। उन्होंने तलवारें, भाले और गदाएँ उठाईं, और देवी को घेर लिया। उनका उद्देश्य देवी को बलपूर्वक पकड़कर महिषासुर के सामने प्रस्तुत करना था।
देवी अम्बिका शांत और स्थिर खड़ी रहीं। उनके मुख पर न तो भय था, न ही चिंता। उनके दिव्य नेत्रों में करुणा और शक्ति का अद्भुत संगम था। जैसे ही राक्षस निकट पहुंचे, देवी ने सिंहनाद किया, जो आकाश में गूंज उठा। उस सिंहनाद से राक्षसों के हृदय काँप उठे, और वे भयभीत हो गए। यह देवी के क्रोध का संकेत था, जो अब प्रकट होने वाला था। अब युद्ध अवश्यम्भावी था। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि देवी चामुंडा का भीषण युद्ध किस प्रकार होता है।
अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में, चंड और मुंड द्वारा देवी अम्बिका को देखा जाता है और महिषासुर के लिए प्राप्त करने की इच्छा की जाती है। उनके संदेशवाहक के माध्यम से देवी की चुनौती और तत्पश्चात राक्षसों का आक्रमण होता है। यह अध्याय दिखाता है कि अहंकार और काम कैसे विनाश का कारण बन सकते हैं।
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