Shiv Ji Ki Aarti | शिव जी की आरती – बोल, विधि और महत्व

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शिव जी की आरती – परिचय
शिव जी की आरती भगवान शिव की स्तुति में गाई जाने वाली एक भक्तिमय प्रार्थना है। यह आरती विशेष रूप से भगवान शिव को समर्पित है और इसे प्रातःकाल, संध्याकाल या किसी विशेष अवसर पर गाया जाता है। माना जाता है कि इस आरती की रचना अज्ञात है, परन्तु यह सदियों से शिव भक्तों के हृदय में बसी हुई है। यह आरती शिव के गुणों, उनकी महिमा और उनके प्रति समर्पण को व्यक्त करती है।
हिंदू पूजा पद्धति में आरती का महत्वपूर्ण स्थान है, यह भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करने का एक माध्यम है। शिव जी की आरती विशेष रूप से शक्तिशाली मानी जाती है क्योंकि यह भगवान शिव को प्रसन्न करती है और भक्तों को उनकी कृपा प्राप्त करने में मदद करती है। यह आरती वातावरण को शुद्ध करती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
शिव जी की आरती के बोल
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
कर मध्ये कमण्डलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
आरती का अर्थ
पहले अंतरे में 'जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा' का अर्थ है, हे शिव, आपकी जय हो। ओंकार स्वरूप शिव, आपकी जय हो। 'ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा' का अर्थ है कि आप ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों रूप हैं और आपने पार्वती जी को अपने आधे अंग में धारण किया है। यह शिव के त्रिदेव स्वरूप और शक्ति के साथ उनके अटूट संबंध को दर्शाता है।
आरती का मुख्य भाव भक्त की भगवान शिव के प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति है। भक्त शिव से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता है। आरती गाते समय भक्त शिव की महिमा का वर्णन करता है और उनसे अपनी मनोकामनाएं पूर्ण करने की प्रार्थना करता है। यह आरती शिव के प्रति प्रेम और भक्ति का प्रतीक है।
आरती करने की विधि
आरती की थाली में दीपक (घी या तेल का), कपूर, फूल, धूप, अक्षत (चावल), कुमकुम और जल होना चाहिए। कुछ लोग फल और मिठाई भी रखते हैं। थाली को सजाकर भगवान के सामने प्रस्तुत किया जाता है।
आरती को भगवान की मूर्ति के सामने घड़ी की दिशा में घुमाया जाता है। आमतौर पर, आरती को चार बार चरणों पर, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर और सात बार पूरे शरीर पर घुमाया जाता है। आरती घुमाते समय भक्त भगवान के नाम का जाप करते हैं या आरती के बोल गाते हैं।
शिव की आरती सामान्यतः मंगला आरती (प्रातःकाल), संध्या आरती (शाम) और शयन आरती (रात) के समय की जाती है। हर आरती का अपना विशेष महत्व होता है और भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार किसी भी समय आरती कर सकते हैं।
आरती के लाभ
- शिव की कृपा – आरती करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। यह माना जाता है कि आरती शिव के आशीर्वाद को प्राप्त करने का एक सरल और प्रभावी तरीका है।
- घर में सुख-शांति – नियमित रूप से शिव जी की आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे सुख और शांति का वातावरण बना रहता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में मदद करती है।
- मनोकामना पूर्ति – भक्त सच्चे मन से शिव जी की आरती करता है, तो उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह आरती भक्तों को जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करती है।
निष्कर्ष
शिव जी की आरती का दिव्य महत्व है; यह लाखों लोगों द्वारा प्रिय है, इसका पवित्र उद्गम है, और यह शिव पूजा की परंपरा में विशेष है क्योंकि यह भक्तों को भगवान शिव के साथ गहरे, व्यक्तिगत संबंध का अनुभव कराती है, उन्हें उनकी दिव्य उपस्थिति से जोड़ती है और उनके जीवन में शांति और समृद्धि लाती है। यह आरती शिव के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति का प्रतीक है।
सभी भक्तगण पूर्ण श्रद्धा के साथ प्रतिदिन इस आरती का गायन करें। जय शिव!
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