काली माता कथा – अध्याय 3: काली का क्रोध और तांडव | Tilak Kathayein - Tilak Kathayein
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काली माता कथा – अध्याय 3: काली का क्रोध और तांडव

Tilak Kathayein12 Apr 202634 views📖 1 min read
काली माता कथा
काली माता कथा का अध्याय 3 — काली का क्रोध और तांडव। युद्ध के बाद, काली का क्रोध इतना भयंकर होता है कि वह विनाशकारी तांडव नृत्य करने लगती हैं।

काली का क्रोध और तांडव

पिछले अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार माँ काली ने राक्षसों का संहार करने के लिए भयानक रूप धारण किया। चंड, मुंड और रक्तबीज जैसे दुर्दांत राक्षसों को उन्होंने अपने प्रचण्ड वेग से परास्त कर दिया। परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद भी, काली का क्रोध शांत नहीं हुआ, अपितु और भी प्रचंड हो गया।

संहार का अंत, क्रोध का आरंभ

रणभूमि राक्षसों के रक्त से रंगी थी। काली का खड्ग अभी भी लहू से सना था। उनकी आँखें धधकती हुई अग्नि के समान थीं और उनकी सांसें प्रचंड तूफ़ान के समान। उन्होंने राक्षसों के कटे हुए सिरों की माला पहनी हुई थी, जो उनके प्रचंड रूप को और भी भयंकर बना रही थी। उनके मुख से लगातार 'हूम्' की ध्वनि निकल रही थी, जो पूरे ब्रह्माण्ड में गूंज रही थी। काली के चारों ओर एक भयावह शांति व्याप्त थी, जो किसी भी क्षण टूटने को आतुर थी। देवताओं और ऋषियों ने भी भयभीत होकर अपनी आँखें मूंद ली थीं। वे जानते थे कि काली का यह क्रोध पूरे ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता रखता है।

“यह क्या हो रहा है? क्या राक्षसों का संहार करने के बाद भी माँ का क्रोध शांत नहीं होगा?” इंद्रदेव ने भयभीत स्वर में कहा। “यदि माँ काली का क्रोध इसी प्रकार बढ़ता रहा, तो यह पूरी पृथ्वी और स्वर्ग लोक को भी भस्म कर देगा,” नारद मुनि ने चिंता व्यक्त की। वे सभी मिलकर माँ काली को शांत करने के उपाय सोचने लगे, पर कोई भी मार्ग उन्हें नहीं सूझ रहा था।

काली का तांडव, धरती पर हाहाकार

अचानक मां काली ने तांडव नृत्य आरंभ कर दिया। उनके पैर धरती पर पड़ते ही धरती कांपने लगी और पर्वत हिलने लगे। समुद्र में भीषण ज्वार उठने लगे और आकाश में बिजली कड़कने लगी। उनका प्रत्येक कदम विनाश का प्रतीक था। उनके तांडव से त्राहि-त्राहि मच गई। धरती पर हाहाकार मच गया। लोग भय से कांपने लगे और अपने घरों में छिप गए। पशु-पक्षी चीखने लगे और आकाश में उड़ने लगे। चारों ओर विनाश का मंजर दिखाई देने लगा।

माँ काली का क्रोध इतना भयानक था कि उनके तांडव से धरती का संतुलन बिगड़ने लगा। नदियाँ अपने मार्ग से भटक गईं और जंगल आग में जलने लगे। चारों ओर निराशा और भय का वातावरण व्याप्त हो गया। किन्तु, भक्तों के मन में आशा की किरण थी। उन्हें विश्वास था कि माँ काली अवश्य ही शांत होंगी और अपनी कृपा दृष्टि से इस विनाश को रोकेंगी। वे निरंतर माँ के नाम का जाप कर रहे थे और उनसे प्रार्थना कर रहे थे कि वे अपने क्रोध को शांत करें और धरती को बचाएं।

विनाश की ओर बढ़ती सृष्टि

काली के तांडव की गति तीव्र होती जा रही थी और सृष्टि विनाश की ओर अग्रसर हो रही थी। देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से प्रार्थना की कि वे इस विनाश को रोकने के लिए कुछ करें। ब्रह्मा जी ने कहा कि केवल शिव ही काली के क्रोध को शांत कर सकते हैं। विष्णु जी ने शिव जी से प्रार्थना की कि वे काली को शांत करें और सृष्टि को विनाश से बचाएं। अब सब की दृष्टि कैलाश पर्वत की ओर थी, जहाँ भगवान शिव अपनी समाधि में लीन थे।

अध्याय 3 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि कैसे राक्षसों का संहार करने के बाद माँ काली का क्रोध शांत नहीं हुआ, बल्कि और भी प्रचंड हो गया। उनके तांडव से धरती पर हाहाकार मच गया और सृष्टि विनाश की ओर अग्रसर हो गई। इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध कितना विनाशकारी हो सकता है और हमें हर परिस्थिति में शांत रहने का प्रयास करना चाहिए।

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