ज्वाला जी माता कथा – अध्याय 4: अकबर की परीक्षा: चमत्कारी ज्वाला

अकबर की परीक्षा: चमत्कारी ज्वाला
पिछले अध्याय में हमने ज्वाला जी के स्थान की खोज के बारे में पढ़ा। राजा भूमि चंद अपनी भक्ति और अथक प्रयासों से उस पवित्र स्थान तक पहुंचे जहाँ माँ ज्वाला निरंतर प्रज्वलित हो रही थीं। अब इस अध्याय में, हम मुगल बादशाह अकबर की परीक्षा और माँ ज्वाला के चमत्कार को देखेंगे। अकबर, अपनी शक्ति और साम्राज्य के अहंकार में, माँ ज्वाला की शक्ति को चुनौती देने का प्रयास करता है, लेकिन माँ की दिव्य शक्ति के सामने उसे नतमस्तक होना पड़ता है।
अकबर का अहंकार
दिल्ली के सिंहासन पर बैठा अकबर, अपनी शक्ति और वैभव के नशे में चूर था। उसे अपने साम्राज्य की विशालता पर गर्व था और वह यह मानने को तैयार नहीं था कि कोई ऐसी शक्ति भी हो सकती है जो उसकी पहुंच से परे हो। जब उसने ज्वाला जी के मंदिर और वहां प्रज्वलित अद्भुत ज्वाला के बारे में सुना, तो उसके मन में शंका उत्पन्न हुई। उसे लगा कि यह सब ब्राह्मणों द्वारा फैलाया गया भ्रम है, एक चाल है लोगों को बेवकूफ बनाने की। उसे यह बात सहन नहीं हुई कि कोई शक्ति उसकी सत्ता को चुनौती दे सकती है, भले ही वह शक्ति आध्यात्मिक ही क्यों न हो। उसके दरबारियों ने उसे समझाने की कोशिश की कि यह एक दैवीय चमत्कार है, लेकिन अकबर का अहंकार उसे सच सुनने नहीं दे रहा था। उसका मन इन ज्वालाओं को बुझाने और इस 'चमत्कार' का पर्दाफाश करने के लिए बेचैन हो उठा।
अकबर ने अपने वज़ीर से कहा, "यह कैसा चमत्कार है जो मेरे दरबार तक नहीं पहुंच पाया? यह ज्वाला क्या है, और क्यों लोग इसकी पूजा करते हैं? मुझे यह सब धोखा लगता है। मैं खुद जाकर इस ज्वाला को बुझाऊंगा और दिखाऊंगा कि सच्चाई क्या है!" वज़ीर ने डरते हुए कहा, "जहांपनाह, यह ज्वाला साधारण नहीं है। यह माँ भगवती का रूप है। इसे बुझाने का प्रयास करना विनाशकारी हो सकता है!" अकबर ने क्रोधित होकर उत्तर दिया, "चुप रहो! मैं किसी देवी-देवता को नहीं मानता। मैं सिर्फ अपनी शक्ति पर विश्वास करता हूं। आदेश है, कल ही ज्वाला जी के लिए कूच किया जाए!"
ज्वाला बुझाने का प्रयास
अकबर बड़ी सेना और उपकरणों के साथ ज्वाला जी के मंदिर पहुंचा। उसने मंदिर के चारों ओर डेरा डलवाया और तुरंत ज्वाला को बुझाने के लिए योजना बनाने लगा। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे नहरों से पानी लाकर ज्वाला पर डालें। सैनिकों ने अथक प्रयास किया, लेकिन ज्वाला पर पानी डालने से वह और भी तेज हो गई। पानी की शक्ति ज्वाला को शांत करने में विफल रही। अकबर ने फिर चमड़े का तेल और अन्य ज्वलनशील पदार्थ ज्वाला पर डलवाए, यह सोचकर कि इससे ज्वाला बुझ जाएगी, लेकिन इससे ज्वाला और भी प्रचंड रूप धारण कर गई। ज्वाला की लपटें आसमान छूने लगीं, और गर्मी इतनी बढ़ गई कि सैनिकों को पीछे हटना पड़ा।
ज्वाला, अकबर के सभी प्रयासों के बाद भी, अविचल और अदम्य बनी रही। यह माँ भगवती की शक्ति का प्रमाण था। ज्वाला की गर्मी अकबर के अहंकार को पिघला रही थी, और उसके मन में डर समाने लगा। उसने देखा कि ज्वाला किसी भी मानवीय प्रयास से परे है। यहां तक कि भीषण बारिश और तूफान भी ज्वाला को शांत नहीं कर पाते थे। यह एक अलौकिक शक्ति थी, एक दैवीय चमत्कार जो उसकी समझ से परे था।
स्वर्ण छत्र की भेंट
अकबर को अंततः अपनी गलती का एहसास हुआ। उसकी शक्ति और अहंकार माँ ज्वाला के सामने बौने साबित हुए। उसे समझ में आया कि यह ज्वाला कोई साधारण अग्नि नहीं, बल्कि स्वयं भगवती का स्वरूप है। पश्चाताप से भरे मन से, अकबर ने माँ ज्वाला के चरणों में नतमस्तक होने का निर्णय लिया। उसने अपने खजाने से एक स्वर्ण छत्र बनवाया और उसे माँ ज्वाला को अर्पित करने का फैसला किया। लेकिन, जैसे ही स्वर्ण छत्र मंदिर में स्थापित किया गया, वह पिघल कर एक अजीब धातु में परिवर्तित हो गया, जो आज भी वहां देखा जा सकता है। यह माँ ज्वाला की महिमा का एक और प्रतीक था, यह दर्शाता है कि दिखावे और अहंकार से अर्पित की गई भेंट माँ को स्वीकार्य नहीं है। इस घटना के बाद, अकबर का हृदय परिवर्तित हो गया और उसने माँ ज्वाला की शक्ति को स्वीकार किया।
अध्याय 4 का सार: इस अध्याय में हमने देखा कि किस प्रकार अकबर ने अपने अहंकार में चूर होकर ज्वाला जी को बुझाने का प्रयास किया, लेकिन माँ ज्वाला की असीम शक्ति के सामने उसकी सारी कोशिशें विफल रहीं। अंततः उसने अपनी भूल स्वीकार की और माँ के चरणों में नतमस्तक होकर स्वर्ण छत्र भेंट किया, जो माँ भगवती के अस्वीकार का प्रतीक बना, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर के सामने अहंकार व्यर्थ है, भक्ति और श्रद्धा ही सच्ची भेंट है।
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