एकादशी व्रत कथा

Aja Ekadashi | अजा एकादशी – व्रत कथा, विधि और लाभ 2026

Tilak Kathayein19 May 2026149 views
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भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'अजा एकादशी' (आनंदा एकादशी) कहा जाता है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, यह पावन व्रत समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों, दरिद्रता और पूर्व जन्म के कर्म बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि गौतम के निर्देश पर अजा एकादशी का कठोर व्रत किया था, जिसके प्रभाव से उनका खोया हुआ राज्य, परिवार और सम्मान पुनः प्राप्त हुआ। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के 'ऋषिकेश' स्वरूप की पूजा तथा रात्रि जागरण का विशेष विधान है।

अजा एकादशी – परिचय

अजा एकादशी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। 2026 में यह एकादशी 7 सितंबर को पड़ेगी। 'अजा' का अर्थ है 'जन्म न लिया हुआ' या 'कभी क्षय न होने वाला'। इस एकादशी का नाम अजा इसलिए है क्योंकि इस व्रत को करने से व्यक्ति के सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। अन्य सभी एकादशियों में अजा एकादशी का विशेष महत्व है, इसे सभी एकादशी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह व्रत करने वाले को जीवन में कभी भी कष्ट या दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता।

यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के और इस जन्म के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, जिससे वह भगवान विष्णु के दिव्य लोक को प्राप्त होता है। इसलिए, इसे सभी एकादशियों में श्रेष्ठ और अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

अजा एकादशी का महत्त्व

अर्जुन ने कहा: हे पुण्डरिकाक्ष! मैंने श्रावण शुक्ल एकादशी अर्थात पुत्रदा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप कृपा करके मुझे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है?

श्रीकृष्ण ने कहा: हे कुन्ती पुत्र! भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं। इसका व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलोक और परलोक में मदद करने वाली इस एकादशी व्रत के समान संसार में दूसरा कोई व्रत नहीं है।

अजा एकादशी की व्रत कथा

अब ध्यानपूर्वक इस एकादशी का माहात्म्य श्रवण करो: पौराणिक काल में भगवान श्री राम के वंश में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा हरिश्चन्द्र नाम के एक राजा हुए थे। राजा अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रसिद्घ थे।

एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्ववामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। सुबह विश्वामित्र वास्तव में उनके द्वार पर आकर कहने लगे तुमने स्वप्न में मुझे अपना राज्य दान कर दिया।

राजा ने सत्यनिष्ठ व्रत का पालन करते हुए संपूर्ण राज्य विश्वामित्र को सौंप दिया। दान के लिए दक्षिणा चुकाने हेतु राजा हरिश्चन्द्र को पूर्व जन्म के कर्म फल के कारण पत्नी, बेटा एवं खुद को बेचना पड़ा। हरिश्चन्द्र को एक डोम ने खरीद लिया जो श्मशान भूमि में लोगों के दाह संस्कारा का काम करवाता था।

स्वयं वह एक चाण्डाल का दास बन गया। उसने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम किया, किन्तु उसने इस आपत्ति के काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा।

जब इसी प्रकार उसे कई वर्ष बीत गये तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा। वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगा कि मैं क्या करूँ? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठा था कि गौतम् ऋषि उसके पास पहुँचे। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुःख-भरी कथा सुनाने लगे।

राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने राजा से कहा: हे राजन! भादों माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।

महर्षि गौतम इतना कहकर आलोप हो गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया। उन्होने अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा।

व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया।

हे राजन! यह सब अजा एकादशी के व्रत का प्रभाव था।

जो मनुष्य इस उपवास को विधानपूर्वक करते हैं तथा रात्रि-जागरण करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। इस एकादशी व्रत की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति हो जाती है।

व्रत विधि

दशमी की रात्रि से ही व्रत का आरंभ हो जाता है। इस रात को सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। भूमि पर शयन करना उत्तम माना जाता है।

एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठकर व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें, जिसमें उन्हें पुष्प, फल, तुलसी दल और धूप-दीप अर्पित करना शामिल है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ विष्णवे नमः' मंत्र का यथासंभव जाप करें।

समयकरने का कार्य
प्रातः कालब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
सूर्योदय के पश्चातभगवान विष्णु की प्रतिमा का अभिषेक करें और पूजा आरंभ करें।
दिन भरफलाहार करें और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते रहें।
शाम कोसंध्या आरती करें और भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें।
रात्रि मेंभगवान विष्णु का ध्यान करते हुए रात्रि जागरण करें।
मध्य रात्रिभगवान को भोग लगाएं और प्रसाद वितरण करें।

द्वादशी के दिन, सूर्योदय के बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। इसके पश्चात स्वयं पारण (व्रत खोलना) करें। पारण के समय सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।

व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं

अजा एकादशी के व्रत में फलाहार, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, दूध और दुग्ध उत्पाद, मेवा (जैसे बादाम, काजू, किशमिश), और अनाज से बने व्यंजन (जैसे पकौड़ी, रोटी) खा सकते हैं। नमक के रूप में सेंधा नमक का प्रयोग करें।

इस व्रत में चावल, दालें, बैंगन, लहसुन, प्याज और मांसाहार का सेवन पूर्णतः वर्जित है। चावल का सेवन इसलिए नहीं किया जाता क्योंकि ऐसी मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से मनुष्य राक्षस योनि में जन्म लेता है। लहसुन और प्याज तामसिक प्रवृत्ति के होते हैं, जो व्रत के नियमों के विरुद्ध हैं।

अजा एकादशी व्रत के लाभ

  • पाप-मोचन – इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के समस्त पाप, चाहे वे इस जन्म के हों या पूर्व जन्मों के, नष्ट हो जाते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार, अजा एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के दस हजार वर्ष के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति – यह व्रत व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाकर भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति करवाता है।
  • सांसारिक लाभ – इस व्रत के करने से व्यक्ति को धन, धान्य, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
  • स्वास्थ्य लाभ – उपवास रखने से शरीर की पाचन क्रिया सुधरती है, शरीर विषाक्त पदार्थों से मुक्त होता है और मानसिक शांति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

2026 में अजा एकादशी कब है?

2026 में अजा एकादशी 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त 14 अगस्त की रात्रि 09:08 बजे से 15 अगस्त की रात्रि 07:34 बजे तक रहेगा।

अजा एकादशी व्रत में चावल क्यों नहीं खाते?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी तिथि पर चावल का सेवन वर्जित माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से मनुष्य राक्षस योनि में जन्म लेता है। कुछ कथाओं के अनुसार, देवी एकादशी चावल के रूप में उत्पन्न हुई थीं और उन्होंने भगवान विष्णु से वरदान मांगा था कि जो भी एकादशी के दिन चावल खाए, वह पाप का भागी बने।

क्या बीमार व्यक्ति अजा एकादशी व्रत रख सकता है?

बीमार, गर्भवती महिलाएं या बहुत वृद्ध व्यक्ति पूर्ण उपवास न रखकर केवल फलाहार कर सकते हैं या दिन में एक बार सात्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। वे अपनी सुविधानुसार व्रत में कुछ छूट ले सकते हैं, लेकिन मन में श्रद्धा बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

अजा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व अद्वितीय है, जो इसे सभी एकादशियों में श्रेष्ठ बनाता है। भगवान विष्णु ऐसे भक्तों को जो इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से रखते हैं, उन्हें सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति और अक्षय पुण्य का वरदान देते हैं। यह एकादशी न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है, जिससे साधक को जन्म-जन्मांतर की पीड़ा से छुटकारा मिलता है।

सभी भक्तों को पूर्ण विश्वास और भक्ति भाव से अजा एकादशी का व्रत रखना चाहिए। अपनी सामर्थ्य अनुसार नियमों का पालन करें और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करें। जय श्री हरि! जय एकादशी माता!

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आज का पंचांग 11 सितम्बर 2026

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