Aigiri Nandini Stotram | अयि गिरिनंदिनी – बोल, अर्थ और महत्व

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अयि गिरिनंदिनी – परिचय
अयि गिरिनंदिनी एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जो माँ दुर्गा को समर्पित है। इसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचा गया माना जाता है और यह कई सदियों से प्रचलित है। यह स्तोत्र महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है।
हिंदी भक्ति संगीत में इस भजन का एक विशेष स्थान है। यह अपनी मधुरता, शक्तिशाली छंदों और माँ दुर्गा के प्रति गहरी श्रद्धा के लिए व्यापक रूप से लोकप्रिय है।
अयि गिरिनंदिनी के बोल (Lyrics)
गिरिवरविंध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते
भगवति हे शितिकंठकुटुंबिनि भूरिकुटुंबिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि कल्मषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरिशिरोमणि तुंगहिमालय शृंगनिजालय मध्यगते
मधुमधुरे मधुकैटभगंजिनि कैटभभंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥
अयि शतखंड विखंडितरुंड वितुंडितशुंड गजाधिपते
रिपुगजगंड विदारणचंड पराक्रमशुंड मृगाधिपते
निजभुजदंड निपातितखंड विपातितमुंड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतांतमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥
सुरललना तटतट तटतट अभिनयोदर नृत्ये रते
हसत रति रुचिरे शशिशेखरे कुसुमायुध बाणरते
दिनकररुचिरे मणिकुंडले शोभितकंधरे लीलारते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधिशिरोऽधिकृतामल शूलकरे
दुमिदुमितामर दुंदुभिनादमहोमुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥
अयि निजहुंकृति मात्र निराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भव शोणित बीजलते
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥
धनुरनुषंग रणक्षणसंग परिस्फुरदंग नटत्कटके
कनकपिशंग पृषत्कनिषंग रसद्भटशृंग हताबटुके
कृतिसुरसंग रवक्षितसंग घटोत्कटशंग कटावटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥
सुरसुतनाथ न वासवबालक नंदनंदन हे गिरिबले
महिमुखमल्ल मथाल्लमथल्लक मल्लरमल्लरते रमते
शुकशुनकाशुन नारदगान नुतात्तपुरा सुरते रमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥
अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांतियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनी करवक्त्रवृते
सुनयन विभ्रम भ्रम भ्रम भ्रम भ्रम भ्रम भ्रम भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लम तल्लम तल्लम मल्लरते
विरचितवल्लि कलल्कल वल्लि दलल्कल वल्लि रते
जितजितजित तलल्लि तलल्लि तलल्लि तलल्लि तलल्लि रते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेंन्दु मलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते
मम तु मतं शिवनामधने भवति कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितारमते
यदुचितमत्र भवत्युरु कुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
भजन का अर्थ
"अयि गिरिनंदिनी" का अर्थ है "हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री"। यह स्तोत्र माँ दुर्गा को संबोधित करते हुए उनकी महिमा का वर्णन करता है।
पहले अंतरे में माँ दुर्गा को देवताओं द्वारा पूजित, दुष्टों का नाश करने वाली और तीनों लोकों का पोषण करने वाली बताया गया है। यह उनकी शक्ति और करुणा का वर्णन है।
यह भजन भक्त को माँ दुर्गा के प्रति पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का अनुभव कराता है। यह भय और नकारात्मकता को दूर करने और शांति और शक्ति प्राप्त करने का मार्ग है।
भजन का इतिहास
अयि गिरिनंदिनी की रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। वे एक महान दार्शनिक और संत थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का प्रचार किया। वे शिव और शक्ति दोनों के भक्त थे।
यह भजन नवरात्रि, दुर्गा पूजा और अन्य धार्मिक अवसरों पर मंदिरों और घरों में गाया जाता है। यह माँ दुर्गा की आराधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भजन के लाभ
- आध्यात्मिक लाभ – यह भजन माँ दुर्गा से जुड़ने और उनकी कृपा प्राप्त करने में मदद करता है। इससे आध्यात्मिक विकास होता है।
- मानसिक लाभ – इस भजन को सुनने और गाने से मन शांत होता है और सकारात्मकता बढ़ती है। यह तनाव और चिंता को कम करता है।
- भक्ति का विकास – नियमित रूप से इस भजन का गायन भक्ति और श्रद्धा को बढ़ाता है। इससे माँ दुर्गा के प्रति प्रेम और समर्पण बढ़ता है।
निष्कर्ष
अयि गिरिनंदिनी माँ दुर्गा के लिए सबसे महान भक्ति रचनाओं में से एक है। इसकी संगीतमय सुंदरता, भावनाओं को जागृत करने की क्षमता और पीढ़ियों से भक्तों द्वारा इसे पसंद किए जाने का कारण इसकी अद्वितीयता है।
भक्तों को प्रेरित किया जाता है कि वे इस भजन को प्रतिदिन प्रेम से गाएं। जय दुर्गा!
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